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प्रकाशक
डे ऋषि | रे |
अल बरकात नेशनल इस्लामिक एकेडमी
सिद्धार्थनयर- भैरहवा नेपाल
जो यादे मुस्तफा से दिल को बहलाया नहीं करते
हक़ीक़त में वह ल्॒त्फे ज़िन्दगी पाया नहीं करते
ज़िक्रे हबीब/&४
मीलादुन्नबी की फ़ज़ीलत
लेखक
(मौलाना) गयासुद्दीन अहमद मिस्बाही
प्रकाशक
अल बरकात नेशनल इस्लामिक एकेडमी,भैरहवा (नेपाल)
बे हनी 3००) ९0 ७-५ के
पेशे लफ्ज़
अल्लाह रब्बुल इज्ज़त का बेपनाह शुक्र और एहसान है
की उस ने हमें इंसान बनाया,और उस से बड़ा करम यह है
की हमें अपने सब से प्यारे हबीब हुजूरे पाक सल्लल्लाहु
अलैहिवसल्लम का उम्मती बनाया, ए वह नबी हैं जिन की
उम्मत में होने की दुआ खुद अम्बियाए किराम और रसूलाने
इजाम करते थे, बड़ी खुशनसीबी की बात है की जिस तरह
उनकी मुबारक ज़ाहिरी ज़िन्दगी हमारे लिए रहमत थी,इसी
तरह अलाह से मुलाक़ात के बाद भी वह हमारे लिए रहमत हैं,
'सुनने कुबरा दोसरी जिल्द के पेज: 246 पर हज़रत अब्दुल्लाह
इब्ने उमर राज़ियाललाहू अन्हु से हदीस रिवायत की गयी है
की रसूलुल्लाह सल्लललाहु अलैहिवसल्लम ने फरमाया : “जिस
ने हज किया और मेरे रौज़े की जियारत की तो ऐसे ही है
जैसे उस ने मेरी ज़िन्दगी में मुझे देखा”
सुभानाल्लाह ! यही वजह है की हम अहले सुन्नत
वल,जमात हर मुश्किल घडी में अपने आक़ा को पुकारते
हैं,और वह अल्लाह रब्बुल इज्ज़त की अता से हमारी मदद
फरमाते हैं, मगर शर्त यह है की हम उनकी सच्ची मुहब्बत
अपने दिलों में बसा लें,वरना अबुजहल हमेशा उन्हें देखता था
उनके शहर में रहता था,मगर मुहब्बत न थी इस लिए फैज़ न
पा सका,मगर सहाबए किराम का अकीदा यह था की आक़ा
हमारे मददगार है,अल्लाह पाक की बारगाह में हमारी शफाअत
3
फरमाने वाले हैं जैसा की कुराने पाक में अल्लाह रब्बुल
इज्ज़त का इरशाद है : “अगर मुसलमान अपनी जानों पर
जुल्म कर बैठें तो आप की बारगाह में आ जाएँ और अल्लाह
पाक से माफ़ी चाहें और अल्लाह के रसूल भी उन के लिए
मगफिरत चाहें तो यह लोग अल्लाह को बख्शने वाला
मेहरबान पाएंगे” इसी आयत की तफ़्सीर ब्यान करते हुवे
हजरत अलामा नसफी अलैहिरहमा अपनी तफसीर
मदारिकुत,तंजील,पहली जिल्द के पेज,234 पर लिखते हैं की
एक दिहात के रहने वाले सहाबी, हुजूरे अकरम सल्लल्लाहु
अलैहिवसल्ल्म के वसाल के बाद उन की क़ब्रे अनवर पर आये
और उनकी क़ब्रे मुबारक से लिपट कर रो रो कर कहने लगे
या रसूलाल्लाह सल्ललल््लाहु अलैहिवसल्लम जब कुरान की यह
आयत नाजिल हुई तो आप की ज़ाहिरी ज़िन्दगी हमारे सामने
थी,ऐ अल्लाह के हबीब मैं ने अपनी जान पर ज़ुल्म कर लिया
है,,मारी बखशिश फरमाएं,और अल्लाह पाक से हमारी
मगफिरत तलब करें,तो क़ब्रे मुबारक से आवाज़ आई,जाओ
तुम को बख्श दिया गया |
लेकिन बड़े अफ़सोस की बात है की आज ऐसी ऐसी
जमातें निकल पड़ी हैं जो अपना पूरा वक़्त सिर्फ नबी ए पाक
सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम की खामियां तलाश करने में
गुजारती हैं,मेरी तमन्ना है की उनके हर हर बातिल अकीदे का
जवाब कुरान व हदीस की रौशनी में इलाक़ाई ज़बान में पेश
किया जाए, मगर एक तरफ असबाब की कमी है तो दूसरी
तरफ साथ देने वालों की, आज हमारे मुसल्रमान भाई जल्सों
में हज़ारों नहीं बल्कि लाखों रोपए बर्बाद कर देते हैं, जहाँ नाम
व नुमूद की बात आती है तो पानी की तरह पैसा बहा देते
हैंभगर मज़बूत काम के लिए सैकड़ों बहाने बनाते है,बस गिने
4
चुने लोग हैं जिन के अन्दर तब्लीगे दीन की तमन्ना है,अलाह
रब्बुल इज्ज़त उनको और जियादा हौसला अता फरमाए,और
उन्हें दीन व दुनिया की बेपनाह दौलतों से नवाजे,और नादानों
को समझ अता फरमाए(आमीन)
इस किताब में नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहिवसल्ल्म
की मुख्तसर सीरत ए पाक का ज़िक्र किया गया है और फिर
यह दिखाया गया है की किस तरह गैर मुस्लिमों ने नबी की
तारीफ की है,हम ने उनका नजरिया इस लिए पेश किया है
ताकि हम मुसलमान यह सोचें की गैर जब ऐसी मोहब्बत और
ऐसा अकीदा रखता है तो हम तो उनके मानने वाले हैं,उनके
नाम लेवा हैं,हमारा फ़र्ज़ है की हम उनका पैगाम भी फैलाएं
और उनकी सीरत को भी अपने दिल में बसालें
दुसरे बाब में हम ने मीलादुन्नबी की फजीलात कुरान
व हदीस और सहाबए किराम व बुज़ुर्गाने दीन के हवाले से
साबित किया है जिस का इनकार वही कर सकता है जिस के
दिल पर मोहर लग चुकी है,वरना इंसाफ की नज़र से देखने
वाला इसे तस्लीम करने पर मजबूर हो जाएगा,
अल्लाह रब्बुल इज्ज़त की बारगाहे आली में दुआ है
की मेरी इस छोटी सी कोशिश को नबी ए पाक सल्लल्लाहु
अलैहिवसल्लम के तुफैल कुबूल फरमाले,और हमारे जिन
भाईयों ने इस की इशाअत(परकाशन)में हिस्सा लिया है उनको
हर हर मोड़ पर कामियाबियाँ अता फरमाए |
गयासुद्दीन अहमद मिस्बाही निज़ामी
ख़ादिम - मदरसा अरबिया सईदुल उलूम,एकमा डिपो
लक्ष्मीपुर महराजगंज उ,प-
5
मजहबे इस्लाम की अज़मत
सभी तारीफ़,अल्लाह रब्बुल इज्ज़त के लिए हैं और दर्द व
सलाम हो हमारे नबी हज़रत मुहम्मद मुस्तफा(सल्लल्लाहो अलैहे
वसलल्लम) पर जो कि अंतिम पैगम्बर(संदेष्ठा)और आखिरी रसूल हैं।
सरकार पाक सलल्लल्लाह तआला अलैहि वसलल्लम के बाद कोई नबी व
रसूल आने वाले नहीं। आप ही की रिसालत व नबूवत स्थापित
रहेगी। इस में कोई शक नहीं की इस्लाम धर्म सभी धर्मों में सब से
बेहतर, सब से उत्तम, सर्व श्रेष्ठ और आखिरी धर्म है। इस्लाम ही एक
ऐसा धर्म है, जो आत्मा तथा शरीर की सभी आवश्यकताओं की पूर्ति
कर सकता है, इस धर्म ने मानवता को कम्यूनिष्ट की तरह किसी
हथियार का ढाल नहीं बनाया और ना ही रहबानियत की तरह मानवता
को उस की अनिवार्य चाहतों से वंचित रखा और ना ही भौतिक
पशिचमी सभ्यता (मगिरबी तहज़ीब) की तरह बगैर किसी नियम प्रबंध
के काम वासना की बाग डोर पर खुला छोड़ दिया।
निसंदेह इस धर्म के अन्दर अनेक प्रकार की
उत्तमता, विशेषताएं, नीतियाँ तथा ऐसी बेमिसाल खूबियाँ हैं, जो और
धर्मों में नहीं पाई जातीं। इस्लाम धर्म वह अंतिम धर्म है, जिस को
अल्लाह ने अपने बन्दों के लिए पसन्द कर लिया है, जैसा कि कुराने
पाक में वर्णित है:
"आज मैं ने तुम्हारे लिये दीन (धर्म) को पूरा कर दिया और
तुम पर अपना इनआम पूरा कर दिया और तुम्हारे लिए इस्लाम धर्म
को पसन्द कर लिया। (सूरतुल माईदा: 3)
इस्लाम धर्म ही केवल ऐसा धर्म है जिस के अन्दर किसी
प्रकार की प्रतिकूलता तथा जटिलता नहीं है। अल्लाह तआला ने
फरमाया:
6
"तथा निःसन्देह हम ने कुरआन को समझने के लिए आसान
कर दिया है, पर क्या कोई नसीहत प्राप्त करने वाला है? (सूरतुल-
क़मरः 7)
इस्लाम ही केवल वह धर्म है जो मानवता की कठिन से
कठिन समस्याओं का समाधान करता है। तथा मानवता के बारे में
सही फिक्र प्रदान करता है और अहकाम के संबंध में जीवन के उन
सभी पहलुओं को उजागर करता है जो उपासना, अर्थशास्त्र, राजनीति,
व्यकितगत समस्याएं तथा विश्व स्तर के संबंध इत्यादि को
सम्मिलित हैं तथा चरित्र के संबंध में मनुष्य एंव समाज को सभ्य
बनाता है।
इस्लाम ही ऐसा धर्म है जिस के अन्दर उन सभी प्रश्नों का
संतोष जनक और इतमिनान बख्श उत्तर मौजूद है, जिस ने मानवता
को आश्चर्य चकित कर रखा है कि मानवता का जन्म क्यों हुआश शुद्ध
पथ (सीधा मार्ग) कौन सा है तथा इस का अंतिम ठिकाना कहाँ है?,
वास्तव में इस्लाम सच्चा मज़हब है, इस लिये कि यह किसी
मनुष्य का बनाया हुआ इंसानी धर्म नहीं है।यह तो अल्लाह पाक का
बनाया हुआ धर्म है (और अल्लाह पाक से बेहतर इंसान के लिए और
कौन धर्म बना सकता है? अल्लाह तआला ने फरमाया:
"विश्वास रखने वाले लोगों के लिये अल्लाह से बेहतर निर्णय
करने वाला कौन हो सकता है? (सूरतुल माइदाः 50)
इस में कोई शक नहीं की इस्लाम पूरे जीवन के लिए एक
पूर्ण विधान है तथा जिस समय इस धर्म को वास्तविक रूप में लागू
करने का अवसर प्रदान किया गया, तो इस ने एक ऐसा आदर्श समाज
तथा सुसजिजत इंसानी सभ्यता प्रदान किया, जिस के अन्दर हर
प्रकार की उन्नति तथा सभ्यता पाई जाती है.
इस्लाम ने तमाम इंसानों को बराबर के अधिकार प्रदान किए।
अब, किसी अरबी व्यकित को किसी अजमी पर और किसी सफेद रंग
५
के व्यकित को किसी काले रंग के व्यकित पर कोई प्रधानता नहीं,
परन्तु यह (प्रधानता) तक्वा और परहेज़गारी और सच्चाई व मानौता
के आधार पर होगी। अतः इस्लाम के अन्दर गोत्र-वंश या रंग या देश
आदि का पक्षपात नहीं है, बलिक सत्य तथा न्याय के सामने सभी
एक समान हैं।
इस्लाम ने बादशाहों को हर व्यकित के विषय में पूर्ण न्याय
देने का आदेश दिया। इस लिए की इस्लाम के अन्दर कोई भी
व्यकित नियम से बाहर नहीं है, इस्लाम ने लोगों को सहयोग तथा
मदद के आदेश दिये और धनवानों को निर्धनों और गरीबों की
सहायता करने और उन के बोझ को हल्का करने तथा उन निर्धनों को
एक उत्तम श्रेणी तक पहुँचाने का आदेश दियाड्स्लाम ने औरतों को
हक़ पर्दान किया उनकी रच्छा के आदेश दिए ,बेवा औरतों को इज्ज़त
देने का प्रावधान बताया.
गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड के अनुसार इस समय पूरी
दुनिया में इस्लाम धर्म लोगों के इस्लाम स्वीकार करने के हिसाब से
सबसे तेजी से फैलने वाला धर्म है. इसमें कोई शक नहीं कि उम्मते
मुहम्मदिया (सललललाहु अलैहिवसल्लम)अरब की भूमि से उभरे
थे,और देखते हि देखते पूरी दुनिया में फ़ैल गए, 2002 के आंकड़ों के
अनुसार दुनिया भर के 80 फीसदी से अधिक मुसलमान गैर अरबी
देशों के थे .॥990 ई. और 2002 के मध्य समय में लगभग 2.5
मिलियन लोगों ने इस्लाम स्वीकार किया. 990 में पूरी दुनिया में
935 लाख लोग मुसलमान थे और 2000 में यह संख्या 4.2 अरब तक
पहुंच गई. जिसका मतलब है कि उस समय दुनिया भर में हर पांच में
से एक व्यक्ति मुसलमान था. 2009 ,में एक अमेरिकी रिपोर्ट के
अनुसार दुनिया भर में लगभग .57 अरब मुसत्रमान मौजूद हैं.
जिनमें से 60 प्रतिशत का संबंध एशिया से है. यह रिपोर्ट पियो मंच
रिसर्च सेंटर द्वारा प्रकाशित की गई जिसमें यह दावा किया गया कि
6
200 में दुनिया के 62. प्रतिशत मुसलमानों का संबंध एशिया से
होगा. इस रिपोर्ट में यह भी खुलासा किया गया कि अगले दो दशकों
में मुस्लिम आबादी पिछले दो दशकों की तुलना में अधिक तेजी से
बढ़ेगी. 990 और 2000 के मध्य समय में वैश्विक मुस्लिम आबादी
2.2 प्रतिशत वार्षिक दर के हिसाब से बढ़ी. इस रिपोर्ट ने यह भी कहा
कि 200 में मुसलमान कुल वैश्विक जनसंख्या (8.9 बिलियन) का
26.4 प्रतिशत होगा. 2 फरवरी 984 में प्रकाशित एक पत्रिका किरिस्चन
प्लेन टरथ पत्रिका में प्रकाशित होने वाले एक बयान के अनुसार
934ई.और।984 के मध्य समय में इस्लाम 2.35 प्रतिशत तक फैला.
इस्लाम के दुनिया में सबसे
तेजी से फैलने की वजह
यह है कि इस्लाम जीवन के हर मोड़ पर मोकम्मल
सही मार्गदर्शन प्रदान करने वाला धर्म है. यह इस्लाम धर्म
इंसान को उसके जन्म और उसके अस्तित्व के उद्देश्य का पता
बताता है. और उसे एक संतुत्रित और समृद्ध जीवन जीने के
लिए दिशानिर्देश देता है जिन पर अमल करके मनुष्य
सांसारिक जीवन को सार्थक बना सके और अपने भविष्य को
बेहतर कर सके.| यही वजह है की हमेशा शुद्ध बुध्धि के लोग
ए कहा करते हैं :की इस्लाम अकेला ऐसा धर्म है जिस पर
दुनिया के सारे शरीफ़ और पढ़े लिखे लोग लोग गर्व कर
सकते हैं, वह अकेला ऐसा दीन है जिस ने सृष्टि(दुनिया)और
उसकी उत्पत्ति के रहस्यों एवं भेदों से पर्दा उठाया है और
तमाम चरणों में सभ्यता एवं संस्क्रति के साथ है।
9
आप को आश्चर्य होगा की आज सब से जियादा वह लोग
इस्लाम कुबूल कर रहे हैं जो अपने धर्म के प्रचारक रह चुके हैं,या जो
इस्लाम की मुखालिफताविरोध)करते रहे हैं,ऐसे लोगों की एक लम्बी
फिहरिस्त है,यहाँ एक ताज़ा मिसाल पेश है |
इस्लाम का विरोध करने वाले डच राजनेता “अनार्ड वॉन
डूर्न” ने इस्लाम धर्म कबूल लिया
लंबे समय तक इस्लाम की आलोचना करने वाले डच
राजनेता अनार्ड वॉन डूर्न ने अब इस्लाम धर्म कबूल कर लिया है.
अनार्ड वॉन डूर्न नीदरलैंड की घोर दक्षिणपंथी पार्टी पीवीवी यानि
फ्रीडम पार्टी के महत्वपूर्ण सदस्य रह चुके हैं. यह वही पार्टी है जो
अपने इस्लाम विरोधी सोच. और इसके कुख्यात नेता गिर्टी
वाइल्डर्स के लिए जानी जाती रही है,मगर वो पांच साल पहले की
बात थी. इसी साल यानी कि 203 के मार्च में अर्नाड डूर्न ने
इस्लाम धर्म क़बूल करने की घोषणा की. नीदरलैंड के सांसद गिर्टी
वाइल्डर्स ने 2008 में एक इस्लाम विरोधी फ़िल्म 'फ़ितना' बनाई थी.
इसके विरोध में पूरे विश्व में तीखी प्रतिक्रियाएं हुईं थीं.
अनार्ड डूर्न जब पीवीवी में शामिल हुए तब पीवीवी एकदम
नई पार्टी थी. मुख्यधारा से अलग-थलग थी. इसे खड़ा करना एक
चुनौती थी. इस दत्र की अपार संभावनाओं को देखते हुए अनार्ड ने
इसमें शामिल होने का फ़ैसला लिया,अनार्ड, पार्टी के मुसलमानों से
जुड़े विवादास्पद विचारों के बारे में जाने जाते थे. तब वे भी इस्लाम
विरोधी थे.
वे कहते हैं:
"उस समय पश्चिमी यूरोप और नीदरलैंड के बहुत सारे रोगों
की तरह ही मेरी सोच भी इस्लाम विरोधी थी. जैसे कि मैं ये सोचता
0
था कि इस्लाम बेहद असहिष्णु है, महिलाओं के साथ ज्यादती करता
है, आतंकवाद को बढ़ावा देता है. पूरी दुनिया में इस्लाम के ख़िलाफ़
इस तरह के पूर्वाग्रह प्रचल्रित हैं
साल 2008 में जो इस्लाम विरोधी फ़िल्म 'फ़ितना'
बनी थी तब अनार्ड ने उसके प्रचार प्रसार में बढ़-चढ़ कर
हिस्सा लिया था. इस फ़िल्म से मुसलमानों की भावनाओं को
काफ़ी ठेस पहुंची थी.
वे बताते हैं, "फ़ितना' पीवीवी ने बनाई थी. मैं तब पीवीवी का
सदस्य था. मगर मैं 'फ़ितना' के निर्माण में कहीं से शामिल नहीं था.
हां, इसके वितरण और प्रोमोशन की हिस्सा ज़रूर था."
अनार्ड को कहीं से भी इस बात का अंदेशा नहीं हुआ किये
फ़िल्म लोगों में किसी तरह की नाराज़गी, आक्रोश या तकलीफ़ पैदा
करने वाली है.
वे आगे कहते हैं, "अब महसूस होता है कि अनुभव और
जानकारी की कमी के कारण मेरे विचार ऐसे थे. आज इसके लिए मैं
वाक़ई शर्मिंदा हूं.
सोच कैसे बदली? अनार्ड ने बताया, "जब फ़िल्म फ़ितना' बाज़ार में
आई तो इसके ख़िलाफ़ बेहद नकारात्मक प्रतिक्रिया हुई. आज मुझे
बेहद अफ़सोस हो रहा है कि मैं उस फ़िल्म की मार्केटिंग में शामिल्र
था." इस्लाम के बारे में अनार्ड के विचार आख़िर कैसे बदलने शुरू
हुए. वे बताते हैं, 'ये सब बेहद आहिस्ता-आहिस्ता हुआ. पीवीवी यानि
फ्रीडम पार्टी में रहते हुए आख़िरी कुछ महीनों में मेरे भीतर कुछ
शंकाएं उभरने लगी थीं. पीवीवी के विचार इस्लाम के बारे में काफ़ी
कट्टर थे, जो भी बातें वे कहते थे वे कुरान या किसी किताब से ली
गई होती थीं." इसके बाद दो साल पहले अनार्ड ने पार्टी में अपनी इन
आशंकाओं पर सबसे बात भी करनी चाही. पर किसी ने ध्यान नहीं
|
दिया. तब उन्होंने कुरान पढ़ना शुरू किया. यही नहीं, मुसलमानों की
परंपरा और संस्कृति के बारे में भी जानकारियां जुटाने लगे.
मस्जिद पहुंचे: अनार्ड वॉन डूर्न इस्लाम विरोध से इस्लाम क़बूल
करने तक के सफ़र के बारे में कहते हैं, "मैं अपने एक सहयोगी से
इस्लाम और कुरान के बारे में हमेशा पूछा करता था. वे बहुत कुछ
जानते थे, मगर सब कुछ नहीं. इसलिए उन्होंने मुझे मस्जिद जाकर
ईमाम से बात करने की सलाह दी." उन्होंने बताया, "पीवीवी पार्टी की
पृष्ठभूमि से होने के कारण मैं वहां जाने से डर रहा था. फिर भी
गया. हम वहां आधा घंटे के लिए गए थे, मगर चार-पांच घंटे बात
करते रहे." अनार्ड ने इस्लाम के बारे में अपने ज़ेहन में जो तस्वीर
खींच रखी थी, मस्जिद जाने और वहां इमाम से बात करने के बाद
उन्हें जो पता चला वो उस तस्वीर से अलहदा था. वे जब ईमाम से
मिले तो उनके दोस्ताने रवैये से बेहद चकित रह गए. उनका व्यवहार
खुला था. यह उनके लिए बेहद अहम पड़ाव साबित हुआ. इस
मुलाक़ात ने उन्हें इस्लाम को और जानने के लिए प्रोत्साहित किया.
वॉन डूर्न के मस्जिद जाने और इस्लाम के बारे में जानने की बात
फ्रीडम पार्टी के उनके सहयोगियों को पसंद नहीं आई. वे चाहते थे कि
वे वही सोचें और जानें जो पार्टी सोचती और बताती है.
अंततः इस्लाम क़बूल लिया: मगर इस्लाम के बारे में जानना एक
बात है और इस्लाम धर्म क़बूल कर लेना दूसरी बात.पहले पहले
अर्नाड के दिमाग में इस्लाम धर्म क़बूल करने की बात नहीं थी.
उनका बस एक ही उद्देश्य था, इस्लाम के बारे में ज्यादा से ज्यादा
जानना. साथ ही वे ये भी जानना चाहते थे कि जिन पूर्वाग्रहों के बारे
में लोग बात करते हैं, वह सही है या यूं ही उड़ाई हुई. इन सबसें उन्हें
सालजडेढ़ साल लग गए. अंत में वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इस्लाम
2
की जड़ें दोस्ताना और सूझ बूझ से भरी हैं. इस्लाम के बारे में ख़ूब
पढने, बातें करमे और जानकारियां मिल्रने के बाद अंततः उन्होंने
अपना धर्म बदल लिया.
अनार्ड के इस्लाम क़बूलने के बाद बेहद मुश्किलों से गुज़रना
पड़ा. वे कहते हैं, "मुझ पर फ़ैसला बदलने के लिए काफ़ी दबाव डाले
गए. अब मुझे ये समझ में आ रहा था कि मेरे देश नीदरलैंड में
लोगों के विचार और सूचनाएं कितनी गलत हैं
परिवार और दोस्तों को झटका: परिवार वाले और दोस्त मेरे फ़ैसले से
अचंभित रह गए. मेरे इस सफ़र के बारे में केवल मां और गर्लफ्रेंड
को पता था. दूसरों को इसकी कोई जानकारी नहीं थे. इसलिए उन्हें
अनार्ड के मुसलमान बन जाने से झटका त्गा.
कुछ लोगों को ये पब्लिसिटी स्टंट लगा, तो कुछ को मज़ाक़.
अनार्ड कहते हैं कि अगर ये पब्लिसिटी स्टंट होता तो दो-तीन महीने
में ख़त्म हो गया होता
वे कहते हैं, "मैं बेहद धनी और भोतिकवादी सोच वाले
परिवार से हूं. मुझे हमेशा अपने भीतर एक ख़ालीपन महसूस होता
था. मुस्लिम युवक के रूप में अब मैं ख़ुद को एक संपूर्ण इंसान
महसूस करने लगा हूं. वो ख़ालीपन भर गया है." (बीबीसी हिंदी रिपोर्ट)
अम्बिया और रसूल/&कहनुरूलण
अल्लाह पाक ने मानव मार्गदर्शन और हिदायत के
लिए कमो बेश एक लाख चौबीस हज़ार अन्बियाए किराम को
मबऊस फरमा कर(भेज कर) मनुष्य पर महान दया किया है,
यह नुफूसे कुदसिया अपने अपने दौर में हुजूरे पाक के आने
की खुश खबरी सुनाते रहे और अंत में अल्लाह पाक ने अपने
प्यारे हबीब ए पाक को भेज कर अपनी रचना में इतना बड़ा
3
एहसान फरमाया कि अगर सारी जीव उम्र भर शुक्र अदा
करती रहे तो भी उसके धन्यवाद का हक़ अदा नही हो सकता.
हज़रत मुहम्मद मुस्तफा(सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम): इस्लाम के
सबसे महाननबीऔर आख़िरी रसूल हैं जिन
कोअल्लाहने कुरआनकरीम जैसी अज़ीम किताब अता
फरमाई,अल्लाह पाक ने कुरआन के ज़रिया आपको जो रिफअत और
ऊंचाई अता की वह किसी और को प्रदान नहीं किया, ये इस्लाम के
आख़री ही नहीं बल्कि सबसे अफज़ल और अज़ीम पैगम्बर है। यही
वजह है की अल्लाह पाक ने आप को भेज कर हम पर अपना एहसान
जताया.स का फरमान है :-
“अल्लाह पाक ने मोमिनों पर बड़ा उपकार किया है कि उन्ही
में से उनके मध्य एक पैगम्बरा[स्न्देष्ठा)भेजा जो उन पर अल्लाह की
आयतें तिलावत करता है,उन्हें पाक करता और उन्हें किताब और
हिक्मत की शिक्षा देता है अगरचे वह इस से पहले स्पस्ट पथ-
भरष्टता में थे” (आल इमरान :१६४)
दूसरी जगहअल्लाह रब्बुल इज्ज़त ने इरशाद फरमाया :
“यह रसूल हैं की हम ने इन में एक को दुसरे पर अफज़ल
किया उन में किसी से अल्लाह ने कलाम किया और उन में कोई वह
है जिसे सब पर दर्जों बुलंद किया"(सूरह अल बकरा ३3)
इस इरशाद से माल्रूम हुआ की अम्बिया ए केराम के मर्तबे
अलग अल्रग हैं उन में बाज़ हजरात बाज़ से अफज़ल हैं ! अगर्चे
नुबूवत में सब समान (बराबर) हैं मगर उन में मर्तबे के लिहाज़ से
फर्क हैं और उन के दर्जे अलग अलग हैं और इस पर तमाम उम्मत
का इत्तेफाक है की हमारे नबी ए पाक सललल्लाहू अलैहि वसलल््लम
तमाम नबियों में सब से अफज़ल और बड़े मर्तबे वाले हैं जैसा की
खुद अल्लाह पाक ने इरशाद फ़रमाया:
4
और हम ने तुम्हारे लिए तुम्हारा ज़िक्र बुलंद किया(पारा ३० सूरह
अलम नशरह लक १-४
हजरते उम्मुल मोमिनीन आयिशा सिद्दीका
राज़ियाल्लाहू तआल्ा अन्हा इरशाद फरमाती हैं की “हज़ूर ए
पाक(सल्लल्लाहू अलैहिवसल्लम)ने फ़रमाया की मेरे पास
जिब्रील आये तो उन्हों ने फ़रमाया : “मैं ने ज़मीन के मशरीक
व मगरिब(पूरब पश्चिम)के हर तबके को उल्नट उल्नट कर देखा
मगर मुहम्मद सल्लल्लाह अलैहे वसललम से अफज़ल किसी
आदमी को न पाया - - सुबहानलला ! इसी की तर्जमानी
इमाम अहमद रज़ा अलैहिईरहमह ने इस तरह की है
यही बोले सिदरा वाले चमने जहाँ के थाले
सभी में ने छान डाले तेरे पाए का न पाया
सब से आला व ओला हमारा नबी
सब से बरतर व बाला हमारा नबी
सारे अच्छों में अच्छा समझिये जिसे
है उस अच्छे से अच्छा हमारा नबी
सब चमक वाले उज्लों में चमका किये
अंधे शीशों में चमका हमारा नबी
आप की ज़ात वह ज़ात है की जिन्होने हमेशा सच बोला और
सच का साथ दिया | आप के दुश्मन भी आप को सच्चा और अत
अमीना[विश्वस्तोकहते थे और ये बात इतिहास में पहली बार मिलती है
की किसी को उसके दुश्मन और शत्रु भी तारीफ़ करें और उसे सच्चा कहें
| आप के आने से पहले उच्च वर्ग के लोगों ने दलित वर्ग को पशुओं से
भी बदतर स्थिति में पहुँचा दिया था, औरतों को जिंदा जलाया जाता
था,बच्चियों को जिंदा दफन कर दिया जाता थाबुराई का एहसास खत्म
हो चूका था एसे में अल्लाह पाक ने अपने बन्दों पर बड़ा किर्षा
किया,और अपना पयारे रसूल को दुनिया में भेजा |
5
प्यारे नबी ऋकी विलादत &७नन््म)
आप (सल्लल्लाहो अलैहि वसललम) का जन्म अरब के शहर
मक्का शरीफ़ में 20 अप्रैल 57. 0,जेठ,628बिक्रमी.दिन
सोमवार,भोर के वक़्त हुआ,उस वक़्त जेठ की पहली तारीख को शुरू
हुवे 3,घन्टे,6,मिनट गुज़र चुके थे। मशहूर रिवायत के मुताबिक
रबीउल अव्वल की ११तारीख थी -
मुहम्मद /##का अर्थ: होता है 'जिस की अत्यन्त प्रशंसा की गई हो।
और यह बात बिलकुल सत्य है की क्या आपसे पहले और क्या आप
के बाद, इस लाल रेतीले अगम रेगिस्तान में बल्कि पूरे विश्व में
जन्मे सभी नबियों,स्सूल्ोंकवियों और शासकों की अपेक्षा आप का
प्रभाव कहीं अधिक व्यापक है। जब आप पैदा हूए तो अरब केवल एक
सूना रेगिस्तान था। आप(सल्लल्लाहो अलैहि वसल्लम) ने इस सूने
रेगिस्तान से एक नए संसार का निर्माण किया, एक नए जीवन का,
एक नई संस्कृति और नई सभ्यता का। आपके द्वारा एक ऐसे नये
राज्य की स्थापना हुई, जो मराकश से ले कर इंडीज़ तक फैला और
जिसने तीन महादवीपों-एशिया, अफ्रीक़ा, और यूरोप के विचार और
जीवन पर अपना अभूतपूर्व प्रभाव डाला।
आप# का नसब नामा
आप का नसब नामा इस प्रकार है -हज़रत मुहम्मद/## बिन
अब्दुल्लाह बिन अब्दुल मुत्तलिब बिन हाशिम बिन अब्दे मुनाफ बिन
कुसे बिन किलाब मुर्रा बिन कअब बिन लुवई बिन ग़ालिब बिन फेहर
बिन मालिक बिन नज़र बिन किनाना बिन खुजैमा बिन मुदरिका बिन
इलियास बिन मुज़र बिन निज़ार बिन मअद बिन अदनान.
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आप # का अखलाक(आचरण)
ऐतिहासिक दस्तावेज़ें साक्षी हैं कि क्या दोस्त, क्या दुश्मन,
आप के सभी समकालीन लोगों ने जीवन के सभी मामलों व सभी
क्षेत्रों में पैगम्बरे- इस्लाम के उत्कृष्ट गुणों, आपकी बेदाग ईमानदारी,
आपके महान नैतिक सदगुणों तथा आपकी अबाध निश्छलता और हर
संदेह से मुक्त आपकी विश्वसनीयता को स्वीकार किया है। यहाँ तक
कि यहूदी और वे लोग जिनको आपके संदेश पर विश्वास नहीं था,वे
भी आपको अपने झगड़ों में पंच या मध्यस्थ बनाते थे, क्योंकि उन्हें
आपकी निरपेक्षता पर पूरा यक्रीन था। वे लोग भी जो आपके संदेश
पर ईमान नहीं रखते थे, यह कहने पर विवश थे-ऐ मुहम्मद, हम
तुमको झूठा नहीं कहते, बल्कि उसका इंकार करते हैं जिसने तुमको
किताब दी तथा जिसने तुम्हें रसूल बनाया!” वे समझते थे कि आप
पर किसी (जिनन आदि) का असर है, जिससे मुक्ति दिलाने के लिए
उन्होंने आप पर सख्ती भी की। लेकिन उनमें जो बेहतरीन लोग थे,
उन्होंने देखा कि आपके ऊपर एक नई ज्योति अवतरित हुई है और वे
उस ज्ञान को पाने के लिए दौड़ पड़े। पैगम्बरे-इस्लाम की जीवनगाथा
की यह विशिष्टता उल्लेखनीय है कि आपके निकटतम रिश्तेदार,
आपके प्रिय चचेरे भाई, आपके घनिष्ट मित्र, जो आप को बहुत निकट
से जानते थे, उन्होंने आपके पैगाम की सच्चाई को दिल से माना
और इसी प्रकार आपकी पैगम्बरी की सत्यता को भी स्वीकार किया।
आप पर ईमान ले आने वाले ये कुलीन शिक्षित एवं बुद्धिमान स्त्रियाँ
और पुरुष आपके व्यक्तिगत जीवन से भली-भाँति परिचित थे। वे
आपके व्यक्तित्व में अगर धोखेबाज़ी और फ्राड की ज़रा-्सी झलक भी
देख पाते या आपमें धनलोलुपता देखते या आपमें आत्म विश्वास की
कमी पाते तो आपके चरित्र-निर्माण, आत्मिक जागृति तथा समाजोद्वार
[7
की सारी आशाएं ध्वस्त होकर रह जातीं। इसके विपरीत हम देखते हैं
कि अनुयायियों की निष्ठा और आपके प्रति उनके समर्थन का यह
हाल था कि उन्होंने स्वेच्छा से अपना जीवन आपको समर्पित करके
आपका नेतृत्व स्वीकार कर लिया। उन्होंने आपके लिए यातनाओं
और ख़तरों को वीरता और साहस के साथ झेला, आप पर ईमान लाए,
आपका विश्वास किया, आपकी आज्ञाओं का पालन किया और आपका
हार्दिक सम्मान किया और यह सब कुछ उन्होंने दित्न दहला देनेवाली
यातनाओं के बावजूद किया तथा सामाजिक बहिष्कार से उत्पन्न घोर
मानसिक यंत्रणा को शान्तिपूर्वक सहन किया। यहाँ तक कि इसके
लिए उन्होने मौत तक की परवाह नहीं की। क्या यह सब कुछ उस
हालत में भी संभव होता यदि वे अपने नबी में तनिक भी भ्रष्टता या
अनैतिकता पाते निसंदेह पैगम्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा
सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम का व्यक्तित्व सृष्टि की
महानताओं और परिपूर्णताओं का चरम बिंदु है। यह व्यक्तित्व,
महानता के उन पहलुओं की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है जो मनुष्यों
के विवेक की पहुंच के भीतर हैं जैसे सूझबूझ,; बुद्धि, तत्वज्ञान, उदारता,
कृपा, दया, क्षमाशीलता आदि और उन पहलुओं की दृष्टि से भी जो
मानव बुद्धि की पहुंच से ऊपर हैं।
रसूले पाक» की शाने यतीमी
आप जब अपनी माँ के पेट मे थे तभी आप के
वालिदा[पिता)का इन्तेकाल हो गया और जब,६ बरस के हुवे तो आप
की माँ ने भी दुनिया को छोड दिया फिर आप की परवरिश आप के
दादा अब्दुल मुत्तलिब ने की.उनके बाद आप के चचा अबू तालिब ने
की ,अल्लाह पाक की शान भी अजब निराली है ,एक ऐसी ज़ात जो
सब से अफज़ल और बेहतर है उसे यतीम कर दिया मगर इस में भी
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अल्लाह पाक की हिकमत थी,और दुनिया वालों को बताना था की
देखो जिसे मैं ऊंचा करना चाहता हूँ उस को किसी की सहायता की
आवश्यकता नहीं होती मैं अपने महबूब का मददगार हूँ, मैं उसकी
हिफाज़त करने वाला हूँ आप को उम्मी(अनपढ़/ बनाया ताकि कोई
आप का उस्ताज़ न बन सके की कहीं दुनिया वाले ए न कहें की
उस्ताज़ तो शागिर्द से बेहतर होता है इस लिए अल्लाह पाक ने आप
को खुद इल्म सिखाया और ऐसा सिखाया की सारी दुनिया का इल्म
आप के इल्म का एक ज़र्रा भी नहीं जैसा की कुराने मजीद में है :
“ए महबूब हम ने आप को वह सब सिखा दिया जो आप नहीं
जानते थे”(सूर:अत् निसा पारा ५आयत,११३)
आप सल्ललल््लाहु अलैहिवसललम की अजमत और शान के
सुबूत के लिए इस से बढ़ कर और कया दलील होगी की, खुद अल्लाह
रब्बुल इज्ज़त आप पर दुरूद भेजता है,और उसके फिरिश्ते दुसूद
भेजते हैं,और हम मोमिनों के लिए फरव्र की बात है की अल्लाह पाक
ने हमें भी,अपने नबी ए पाक पर दुसूद व सलाम पढ़ने का तुहफा
अता फ़रमाया :-जैसा की कुराने पाक में अल्लाह सुबहानुहू व तआला
का हुक्म है ।
“बेशक,अल्लाह और उसके फिरिश्ते पैगम्बर/## पर दुरूद
भेजते हैं,तो ए ईमान वालो तूम भी उन पर खूब दुरुद और सलाम
भेजा करो (सूरः अल अहज़ाब,५६)
नबी ए पाक गैरों की नज़र में
अबू जहल की गवाही - अबू जहल जो आप का सब से बड़ा दुश्मन
था और हमेशा आप को सताने की कोशिश करता था जब उस से
पुछा गया की मुहम्मद सच्चे हैं या झूठे तो उस ने कहा खुदा की
क़सम मुहम्मद सच्चे हैं उन्होंने कभी झूट नहीं बोला |
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इस्लाम लाने से पूर्व
(हज़रत)अबू सुफ्यान की गवाही
इस्लाम लाने से पूर्व अबू सुफ्यान नबी पाक के कट्टर
दुश्मनों में से थे मगर जब उन से हिरकल बादशाह ने पूछा की तुम
को (हज़रत) मुहम्मद[सल्ललाल्लाहू अलैहि वसललम) को नुबूवत का
एलान करने से पहले कैसा पाया,क्या वह इस से पहले कभी झूठ
बोलते थे ? तो उनहोंने कहा की नहीं हम ने उन्हें ४० साल की
ज़िन्दगी में कभी झूट बोलते नहीं देखा इस पर हिरकक््ल ने कहा की
जो किसी मामले में झूट न बोले वह अल्लाह पर कैसे झूट बोल
सकता है ,निसंदेह मोहम्मद सच्चे रसूल हैं |
नज़र बिन हारिस के दिल की बात
नज़र बिन हारिस जो जिस ने नबी ए पाक[सल्ल्लाल्लाहू
अलैहि वसलल्लमौको बहुत तकलीफकष्ट)पहुंचाई एक बार वह कुरैश से
कहने लगा ए कुरैश कबीले के लोगो खुदा की क़सम तुम एक एसे
मामले में पड़ गए हो जिस से तुम्हारा सामना कभी न हुवा ;
मुहम्मद[सल्ललाल्लाहू अलैहि वसलल्लम) तुम्हारे बीच पल्ले बढ़े तुम ने
उन को नौजवान होते देखा,उन के हर काम को देखा, वह तुम्हारे बीच
सब से ज्यादा बुध्धिमान]सब से अधिक सत्यवादी([सच बोलने
वाले)और सब से ज्यादा अमानत दार हैं,आज उन के दोनों कनपटियों
के बाल सफ़ेद होगए,और वह तुम्हारे सामने वह संदेश लेकर आए
जिसे सुन कर तुम ने उन्हें जादू गर कह दिया |नहीं खुदा की क़सम
वह जादूगर नहीं | तुम ने उन्हें काहीन कहा .अल्लाह की क़सम वह
काहीन भी नहीं | तथा तुम ने उसे शाएर कहाःउसे दीवाना कहा |
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फिर उस ने कहा ए अहले कुरैश तुम अपने मामले में खूब सोच
समझ लो, कियुंकि तुम्हारे उपर एक गम्भीर मामला आ गया है |
यही कारण था की कुफ्फार आप से हज़ार दुश्मनी के
बावजूद अपनी अमानतें आप के पास रखते थे कियुंकि उनको मालूम
था की ए मक्का के सब से बड़े अमानत दार और सच्चे मनुष्य हैं,
जिस वक़्त आप[(सल्लललाहु अलैहिवसल्लम)मक्का शरीफ से मदीना
हिजरत करके जाने लगे तो आप मक्का वालों की तमाम अमानतें
हज़रत अली राज़ियाललाहू अन्हु को सुपुर्द कर के कहा की इसे फलां
फलां को दे देना, कितनी अजीब बात है की जिस वक्त पूरा मक्का
आप का दुश्मन था, और सिर्फ गिने चुने लोग आप पर ईमान लाये
थे, एसे में आप के पास कुफ्फार का अपनी अमानतें रखना इस बात
का परमाण है की उन्हें आप पर पूरा भरोसा था, यही वजह थी की
बहुत जल्द पूरा अरब आप पर ईमान लाकर मुसलमान होगया |
माइकल एच. हार्ट (॥0॥96| |. ।87
माइकल एच. हार्ट (/७५॥७७ |+ |+80)इकल एच. हार्ट ने अपनी
पुस्तक ॥76 400: 4 रक्षा/ताह्ष ण #6 ॥0056 ##पघ&#्व ?७४5०75 ॥7
##50//जिस में उस ने 400: ड़तिहास़ में सबसे प्रश्रावशात्री व्यक्तियों
की सूची में सब से पहले व्यक्ति के रूप में मजहबे इस्लाम के
पेगंबर हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सल्लललाहु अलैहिवसल्लम को रखा
है, उस में उन्होंने लिखा की हो सकता है की पाठकों को आश्चर्य हो
की हम ने इतिहास की प्र्भावाशाली व्यक्तियों में
(हज़रत)मोहम्मद[सलल्रल्लाहु अलैहिवसल्लम) को सब से ऊपर कियूं
रखा और वह मुझ से इस का कारण पूछेंगे.हालांकि यह हक़ीकत है
पूरी इंसानी तारीख़ में सिर्फ वही एक एसे इंसान थे जो दीनी और
दुनियावी(लोक/परलोक)दोनों एतबार से गैर मामूली तौर पर सब से
ज़यादा कामियाब रहे.
2]
कार्ल मार्क्स का विचार:
उन्नीसवी शताब्दी का यह जर्मन का फ़लसफ़ी (दर्शन
शास्त्री), राजनितिज्ञ एवं क्रान्तिकारी नेता पैगम्बरे इस्लाम
(सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम) के व्यक्तित्व का गहराई से बोध करने
के बाद अपने विचार इस तरह व्यक्त करता है:
मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम) ऐसे इंसान थे जो बुत पूजने
वालों के बीच इृढ़ संकल्प के साथ खड़े हुए और उन्हे एकेश्वर वाद
एवं तोहीद की दावत दी और उनके दिलों में बाक़ी रहने वाली रूह और
आत्मा का बीज बो दिया। इसलिए उन्हे (सल्लल्लाहो
अलैहेवसल्लम) न सिर्फ़ ये कि उच्च श्रेणी के लोगों के दल में
शामित्र किया जाए बल्कि वह इस बात के पात्र हैं कि उनके ईश्वरीय
दूत होने को स्वीकार किया जाए और दित्र की गहराइयों से कहा जाए
कि वह अल्लाह के दूत (रसूल) है।
वेलटर फ्रान्सवी:
निसंदेह हज़रत मोहम्मद ££/ उच्च श्रेणी के इंसान थे,वह
एक कुशल शासक, दानिश्वर तथा कुशत्र विधायक, एक इन्साफ़ पसंद
शासक और सदाचारी पैगम्बब थे, उन्होंने (सल्लल्लाहो
अलैहेवसल्लम) जनता के सामने अपने चरित्र तथा आचरण का जो
प्रदर्शन किया वह इस से ज़्यादा संभव नही था।
जार्ज॑ बरनार्ड शाह
ये शैक्सपियर के बाद इंग्लैंड का सब से बड़ा लेखक है जिस
के विचारों ने धर्म, ज्ञान, अर्थ जगत, परिवार और बनर एवं कला
मे श्रोताओं पर गहरी छाप छोड़ी है। जिस के विचारों ने पश्चिमी
222
जनता के अन्दर उज्जवल सोच की भावना पैदा कर दी। वह पैगम्बरे
इस्लाम के बारे में लिखता है:
में सदैव मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लमोके धर्म के
बारे में, उसके जीवित रहने की विशेषता की वजह से आश्चर्य में पड़
जाता हूँ और उसका सम्मान करने पर ख़ुद को मजबूर पाता हूँ, मेरी
निगाह मे इस्लाम ही अकेला ऐसा धर्म है जिस मे ऐसी विशेषता पाई
जाती है कि वह किसी भी परिवर्तन एवं बदलाव को स्वीकार कर
सकता है और ख़ुद को ज़माने की आवश्यकताओं में ढालने की
क्षमता रखता है। मैं ने मोहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम ) के
दीन के बारे में ये भविष्यवाणी की है कि भविश्व मे यूरोप वालों को
स्वीकार्य होगा जैसा कि आज इस बात की शुरूआत हो चुकी है। मेरा
मानना है कि अगर इस्लाम के पैगम्बर जैसा कोई शासक सारे
ब्रह्माण्ड शासन करे तो इस दुनिया की मुश्किलात एवं समस्याओं
का निपटारा करने में कामयाब हो जाएगा कि इंसान संधि एवं
सौभाग्य तक पहुंच जाएगा जिस की उसे गंभीर आवश्यकता है |
जान डीउड पोर्ट
१८७० ईस्वी में इन्होंने एक किताब लिखी जिसे इन अलफ़ाज़
से शुरू किया “निसंदेह तमाम कवियों और लेखकों,शाशकों में एक भी
ऐसा नहीं हैजिस की ज़िन्दगी(जीवन)मोहम्मद(सल्लल्लाहु
अलैहिवसल्लम) से बेहतर और सच्ची हो (अपालोजी फार मोहम्मद
एंड दी कुरान)
स्वामी विवेकानंद (विश्व-विख्यात धर्मविद्वान)
“..मुहम्मद (सल्त्ल्लाहु अलैहिवसल्लम) इन्सानी बराबरी,
इन्सानी भाईचारे और तमाम मुसलमानों के भाईचारे के पैगम्बर थे।
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जैसे ही कोई व्यक्ति इस्लाम स्वीकार करता है पूरा इस्लाम बिना
किसी भेदभाव के उसका खुली बाहों से स्वागत करता है, जबकि कोई
दूसरा धर्म ऐसा नहीं करता। ...हमारा अनुभव है कि यदि किसी धर्म
के अनुयायियों ने इस (इन्सानी) बराबरी को दिन-प्रतिदिन के जीवन
में व्यावहारिक स्तर पर बरता है तो वे इस्लाम और सिर्फ़ इस्लाम के
अनुयायी हैं। ...मुहम्मद[सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम) ने अपने जीवन-
आचरण से यह बात सिद्ध कर दी कि मुसलमानों में भरपूर बराबरी
और भाईचारा है। यहाँ वर्ण, नस्ल, रंग या लिंग (के भेद) का कोई
प्रश्न ही नहीं। ...इसलिए हमारा पक्का विश्वास है कि व्यावहारिक
इस्लाम की मदद लिए बिना वेदांती सिद्धांत-चाहे वे कितने ही उत्तम
और अद्भुत हों-विशाल्र मानव-जाति के लिए मूल्यहीन (५०३॥।७।७७७) हैं
(टीचिंग्स ऑफ विवेकानंद, पृष्ठ-:2/4, 25, 27, 28)
मुंशी प्रेमचंद (प्रसिद्ध साहित्यकार)
“ जहाँ तक हम जानते हैं,किसी धर्म ने न्याय को इतनी
महानता नहीं दी जितनी इस्लाम ने। ...इस्लाम की बुनियाद न्याय पर
रखी गई है। वहाँ राजा और रंक, अमीर और गरीब, बादशाह और
फ़क़ीर के लिए 'केवल एक' न्याय है। किसी के साथ रियायत नहीं
किसी का पक्षपात नहीं। ऐसी सैकड़ों रिवायतें पेश की जा सकती है
जहाँ बेकसों ने बड़े-बड़े बलशाली आधिकारियों के मुक़ाबले में न्याय
के बल से विजय पाई है। ऐसी मिसालों की भी कमी नहीं जहाँ
बादशाहों ने अपने राजकुमार, अपनी बेगम, यहाँ तक कि स्वयं अपने
तक को न्याय की वेदी पर होम कर दिया है। संसार की किसी सभ्य
से सभ्य जाति की न्याय-नीति कीडस्लामी नन््याय-नीति से तुलना
कीजिए,आप इस्लाम का पल्ला झुका हुआ पायेंगेंजिन दिनों इस्लाम
का झंडा कटक से लेकर डेन्युष तक और तुर्किस्तान से लेकर स्पेन
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तक फ़हराता था मुसलमान बादशाहों की धार्मिक उदारता इतिहास में
अपना सानी (समकक्ष) नहीं रखती थी। बड़े से बड़े राज्यपदों पर गैर-
मुस्लिमों को नियुक्त करना तो साधारण बात थी, महाविद्यालयों के
कुलपति तक ईसाई और यहूदी होते थे...।”
* यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि इस (समता)
के विषय में इस्लाम ने अन्य सभी सभ्यताओं को बहुत पीछे छोड़
दिया है। वे सिद्धांत जिनका श्रेय अब कार्ल मार्क्स और रुसो को दिया
जा रहा है वास्तव में अरब के मरुस्थतर में प्रसूत हुए थे और उनका
जन्मदाता अरब का वह उम्मी,था जिसका नाम मुहम्मद (सल्लल्लाहु
अलैहिवसल्लम) है। आप के सिवाय संसार में और कौन धर्म प्रणेता
हुआ है जिसने ख़ुदा के सिवाय किसी मनुष्य केसामने सर झुकाना
गुनाह ठहराया है |
“..कोमल वर्ग के साथ तो इस्लाम ने जो सलूक किए हैं
उनको देखते हुए अन्य समाजों का व्यवहार पाशविक जान पड़ता है।
किस समाज में स्त्रियों का जायदाद पर इतना हक़ माना गया है
जितना इस्लाम में? ...हमारे विचार में वही सभ्यता श्रेष्ठ होने का
दावा कर सकती है जो व्यक्ति को अधिक से अधिक उठने का अवसर
दे। इस लिहाज़ से भी इस्लामी सभ्यता को कोई दूषित नहीं ठहरा
सकता।”
“हज़रत (मुहम्मद सल्ल- ने फ़रमाया-कोई मनुष्य उस
वक़्त तक मोमिन (सच्चा मुस्लिम) नहीं हो सकता जब तक वह
अपने भाई-बन्दों के लिए भी वही न चाहे जितना वह अपने लिए
चाहता है। ...जो प्राणी दूसरों का उपकार नहीं करता ख़ुदा उससे ख़ुश
नहीं होता। उनका यह कथन सोने के अक्षरों में लिखे जाने योग्य है-
“ईश्वर की समस्त सृष्टि उसका परिवार है वही प्राणी ईश्वर का
(सच्चा) भक्त है जो ख़ुदा के बन्दों के साथ नेकी करता है।” ...अगर
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तुम्हें ख़ुदा की बन्दगी करनी है तो पहले उसके बन्दों से मुहब्बत
करो।”
“सूद (ब्याज) की पद्धति ने संसार में जितने अनर्थ किए हैं
और कर रही है वह किसी से छिपे नहीं है। इस्लाम वह अकेला धर्म
है जिसने सूद को हराम (अवैध) ठहराया है...!”
(इस्लामी सभ्यता' साप्ताहिक प्रताप, विशेषांक दिसम्बर 925)
गुरु नानक जी का कथन
सलाहत मुहम्मदी मुख ही आखु नत - ख़ासा बन्दा सज्या
सर॒मित्रा हूँ मत (अनुवाद)हज़रत मुहम्मद[सल्लल्लाहु
अलैहिवसल्लम)की तारीफ़ और प्रशंसा हमेशा करते चले जाओ ,आप
अल्लाह के ख़ास बन्दे और तमाम नबियों और रसूलों के सरदार हैं
(जन्म साखी विलायत वाली पृष्ठ,२४६/जन्म श्री गुरु नानक पृष्ठ,६१)
तरुण विजय
सम्पादक, हिन्दी साप्ताहिक'पाञज्चजन्य' (राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघपत्रिका)
क्या इससे इन्कार मुम्किन है कि पैगम्बर
मुहम्मद[सल्लल्लाहु अलैहिव्सललमोएक ऐसी जीवन-पद्धति बनाने और
सुनियोजित करने वाली महान विभूति थे जिसे इस संसार ने पहले
कभी नहीं देखा? उन्होंने इतिहास की काया पलट दी और हमारे विश्व
के हर क्षेत्र पर प्रभाव डाला। अतः अगर मैं कहूँ कि इस्लाम बुरा है तो
इसका मतलब यह हुआ कि दुनिया भर में रहने वाले इस धर्म के
अरबों (8॥079) अनुयायियों के पास इतनी बुद्धि-विवेक नहीं है कि
वे जिस धर्म के लिए जीते-मरते हैं उसी का विश्लेषण और उसकी
रूपरेखा का अनुभव कर सकें। इस धर्म के अनुयायियों ने मानव-
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जीवन के लगभग सरे क्षेत्रों में बड़ा नाम कमाया और हर किसी से
उन्हें सम्मान मिला...”
“हम उन (मुसलमानों) की किताबों का, या पैगम्बर के जीवन-
वृत्तांत का, या उनके विकास व उन्नति के इतिहास का अध्ययन
कम ही करते हैं... हममें से कितनों ने तवज्जोह के साथ उस
परिस्थिति पर विचार किया है जो मुहम्मदा[सल्लल्लाहु
अलैहिवसल्लमोके, पैगम्बर बनने के समय, 4 शताब्दियों पहले
विद्यमान थे और जिनका बेमिसाल, प्रबल मुक़ाबला उन्होंने किया?
जिस प्रकार से एक अकेले व्यक्ति के दृढ़ आत्म-बल तथा आयोजन-
क्षमता ने हमारी ज़िन्दगियों को प्रभावित किया और समाज में उससे
एक निर्णायक परिवर्तन आ गया, वह असाधारण था। फिर भी इसकी
गतिशीलता के प्रति हमारा जो अज्ञान है वह हमारे लिए एक ऐसे
मूर्खता के सिवाय और कुछ नहीं है जिसे माफ़ नहीं किया जा
सकता।”
'पैग़म्बब मुहम्मद[सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम)ने अपने
बचपन से ही बड़ी कठिनाइयाँ झेलीं। उनके पिता की मृत्यु, उनके
जन्म से पहले ही हो गई और माता की भी, जबकि वह सिर्फ छः वर्ष
के थे। लेकिन वह बहुत ही बुद्धिमान थे और अक्सर ल्रोग आपसी
झगड़े उन्हीं के द्वारा सुलझवाया करते थे। उन्होंने पररुपर युद्धरत
क़बीलों के बीच शान्ति स्थापित की और सारे क़बीलों में 'अल-अमीन'
(विश्वसनीय) कहलाए जाने का सम्मान प्राप्त किया जबकि उनकी
आयु मात्रा 35 वर्ष थी। इस्लाम का मूल-अर्थ 'शान्ति' था... शीघ्र ही
ऐसे अनेक व्यक्तियों ने इस्लाम ग्रहण कर लिया, उनमें ज़ैद जैसे
गुलाम (90५७) भी थे, जो सामाजिक न्याय से वंचित थे। मुहम्मद
के ख़िलाफ़ तलवारों का निकल आना कुछ आश्चर्यजनक न था,
जिसने उन्हें (जन्म-भूमि 'मक्का' से) मदीना प्रस्थान करने पर विवश
कर दिया और उन्हें जल्द ही 900 की सेना का, जिसमें 700 ऊँट
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और 300 घोड़े थे मुक़ाबला करना पड़ा। 7 रमज़ान, शुक्रवार के दिन
उन्होंने (शत्रु-सेना से) अपने 300 अनुयायियों और 4 घोड़ों (की सेना)
के साथ बद्र की लड़ाई लड़ी। बाक़ी वृत्तांत इतिहास का हिस्सा है।
शहादत, विजय, अल्लाह की मदद और (अपने) धर्म में अंडिग
विश्वास!”
(अंग्रेज़ी दैनिक एशियन एज', ।7 नवम्बर 2003 से उद्धृत)
डॉ. बाबासाहब भीमराव अम्बेडकर
(बैरिस्टर, अध्यक्ष-संविधान निर्मात्री सभा,इण्डिया)
“.इस्लाम धर्म सम्पूर्ण एवं सार्वभौमिक धर्म है जो कि
अपने सभी अनुयायियों से समानता का व्यवहार करता है (अर्थात्
उनको समान समझता है)। यही कारण है कि सात करोड़ अछूत हिन्दू
धर्म को छोड़ने के लिए सोच रहे हैं और यही कारण था कि गाँधी जी
के पुत्र (हरिलाल) ने भी इस्लाम धर्म ग्रहण किया था। यह तलवार
नहीं था कि इस्लाम धर्म का इतना प्रभाव हुआ बल्कि वास्तव में यह
थी सच्चाई और समानता जिसकी इस्लाम शिक्षा देता है...!”
(दस स्पोक अम्बेडकर' चौथा खंड-भगवान दास पृष्ठ 44-45 से उद्धृत)
कोडिक्कल चेलप्पा
(बैरिस्टर, अध्यक्ष-संविधान सभाडड़ण्डिया
“ मानवजाति के लिए अर्पित, इस्लाम की सेवाएं महान हैं।
इसे ठीक से जानने के लिए वर्तमान के बजाय 400 वर्ष पहले की
परिस्थितियों पर दृष्टि डालनी चाहिए, तभी इस्लाम और उसकी महान
सेवाओं का एहसास किया जा सकता है। लोग शिक्षा, ज्ञान और
संस्कृति में उन्नत नहीं थे। साइंस और खगोल विज्ञान का नाम भी
नहीं जानते थे। संसार के एक हिस्से के लोग, दूसरे हिस्से के लोगों
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के बारे में जानते न थे। वह युग अंधकार युग' (09/6986) कहलाता
है, जो सभ्यता की कमी, बर्बरता और अन्याय का दौर था; उस समय
के अरबवासी घोर अंधविश्वास में डूबे हुए थे। ऐसे ज़माने में, अरब
मरुस्थलद्टजो विश्व के मध्य में है-में (पैगम्बर) मुहम्मद[सल्लल्लाह
अलैहिवसल्लम) पैदा हुए।"
पैगम्बर मुहम्मद[सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम) ने पूरे विश्व
को आह्वान दिया कि “ईश्वर एक' है और सारे इन्सान बराबर हैं।”
(इस एलान पर) स्वयं उनके अपने रिश्तेदारों, दोस्तों और नगरवासियों
ने उनका विरोध किया और उन्हें सताया।”
“पैगम्बर मुहम्मद[सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम) हर सतह पर
और राजनीति, अर्थ, प्रशासन, न्याय, वाणिज्य, विज्ञान, कला,
संस्कृति और समाजोद्धार में सफल हुए और एक समुद्र से दूसरे
समुद्र तक, स्पेन से चीन तक एक महान, अद्वितीय संसार की
संरचना करने में सफलता प्राप्त कर ली।
इस्लाम का अर्थ है शान्ति का धर्म! इस्लाम का अर्थ ईश्वर
के विधान का आज्ञापालन' भी है। जो व्यक्ति शान्तिःप्रेमी हो और
कुरआन में अवतरित ईश्वरीय विधान' का अनुगामी हो, 'मुस्लिम'
कहलाता है। कुरआन सिर्फ 'एकेश्वरत्वः और 'मानकसमानता' की ही
शिक्षा नहीं देता बल्कि आपसी भाईचारा, प्रेम, धैर्य और आत्म-
विश्वास का भी आहनान करता है।
इस्लाम के सिद्धांत और व्यावहारिक कर्म वैश्वीय शान्ति व
बंधुत्व को समाहित करते हैं और अपने अनुयायियों में एक गहरे
रिश्ते की भावना को क्रियान्वित करते हैं। यद्यपि कुछ अन्य धर्म
भी मानव-अधिकार व सम्मान की बात करते हैं, पर वे आदमी को,
आदमी को गुलाम बनाने से या वर्ण व वंश के आधार पर, दूसरों पर
अपनी महानता व वर्चस्व का दावा करने से रोक न सके। लेकिन
इस्लाम का पवित्र ग्रंथ स्पष्ट रूप से कहता है कि किसी इन्सान को
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दूसरे इन्सान की पूजा करनी, दूसरे के सामने झुकना, माथा टेकना
नहीं चाहिए। हर व्यक्ति के अन्दर कुरआन द्वारा दी गई यह भावना
बहुत गहराई तक जम जाती है। किसी के भी, ईश्वर के अलावा किसी
और के सामने माथा न टेकने की भावना व विचारधारा, ऐसे बंधनों
को चकना चूर कर देती है जो इन्सानों को ऊँच-नीच और उच्च्तुच्छ
के वर्गों में बाँटते हैं और इन्सानों की बुद्धि-विवेक को गुलाम बनाकर
सोचने-समझने की स्वतंत्रता का हनन करते हैं। बराबरी और आज़ादी
पाने के बाद एक व्यक्ति एक परिपूर्ण, सम्मानित मानव बनकर, बस
इतनी-सी बात पर समाज में सिर उठाकर चलने लगता है कि उसका
झुकना' सिर्फ अल्लाह के सामने होता है।
बेहतरीन मोगनाकार्टा (४७७7४ ००४४) जिसे मानवजाति ने
पहले कभी नहीं देखा था, 'पवित्र क़ुरआन' है। मानवजाति के उद्धार के
लिए पैगम्बर मुहम्मद द्वारा लाया गया धर्म एक महासागर की तरह
है। जिस तरह नदियाँ और नहरें सागर-जल में मिलकर एक समान,
अर्थात सागर-जल बन जाती हैं उसी तरह हर जाति और वंश में पैदा
होने वाले इन्सान-वे जो भी भाषा बोलते हों, उनकी चमड़ी का जो भी
रंग हो-इस्लाम ग्रहण करके, सारे भेदभाव मिटाकर और मुस्लिम
बनकर 'एक' समुदाय (उम्मत), एक अजेय शक्ति बन जाते हैं।”
“ईश्वर की सृष्टि में सारे मानव एक समान हैं। सब एक ख़ुदा
के दास और अन्य किसी के दास नहीं होते चाहे उनकी राष्ट्रीयता
और वंश कुछ भी हो, वह गरीब हों या धनवान।
“वह सिर्फ़ ख़ुदा है जिसने सब को बनाया है।”
ईश्वर की नेमतें तमाम इन्सानों के हित के लिए हैं। उसने
अपनी असीम, अपार कृपा से हवा, पानी, आग, और चाँद व सूरज (की
रोशनी तथा उर्जा) सारे इन्सानों को दिया है। खाने, सोने, बोलने,
सुनने, जीने और मरने के मामले में उसने सारे इन्सानों को एक
जैसा बनाया है। हर एक की रगों में एक (जैसा) ही ख़ून प्रवाहित रहता
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है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि सभी इन्सान एक ही माता-
पिता-आदम और हव्वा-की संतान हैं अतः उनकी नस्ल एक ही है, वे
सब एक ही समुदाय हैं। यह है इस्लाम की स्पष्ट नीति। फिर एक के
दूसरे पर वर्चस्व व बड़प्पन के दावे का प्रश्न कहाँ उठता है? इस्लाम
ऐसे दावों का स्पष्ट रूप में खंडन करता है। अलबत्ता, इस्लाम
इन्सानों में एक अन्तर अवश्य करता है-अच्छे' इन्सान और बुरे'
इन्सान का अन्तर; अर्थात्, जो लोग ख़ुदा से डरते हैं, और जो नहीं
डरते, उनमें अन्तर। इस्लाम एलान करता है कि ईशपरायण व्यक्ति
वस्तुतः महान, सज्जन और आदरणीय है। दरअसल इसी अन्तर को
बुद्धिविवेक की स्वीकृति भी प्राप्त है। और सभी बुद्धिमान, विवेकशील
मनुष्य इस अन्तर को स्वीकार करते हैं।
इस्लाम किसी भी जाति, वंश पर आधारित भेदभाव को बुद्धि
के विपरीत और अनुचित क़रार देकर रद्द कर देता है। इस्लाम ऐसे
भेदभाव के उन्मूलन का आहवान करता है।”
“वर्ण, भाषा, राष्ट्र, रंग और राष्ट्रवाद की अवधारणाएँ बहुत
सारे तनाव, झगड़ों और आक्रमणों का स्रोत बनती हैं। इस्लाम ऐसी
तुच्छ, तंग और पथभ्रष्ट अवधारणाओं को ध्वस्त कर देता है।'
(लेट अस मार्च ट्वईस इस्लाम' पृष्ठ 2529, 34% से उद्धृत)
(श्री कोडिक्कल चेलप्पा ने बाद में इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया)
गांधी जी का इस्लाम के बारे में नजरिया
“इस्लाम अपने अति विशाल युग में भी अनुदार नहीं
था, बल्कि सारा संसार उसकी प्रशंसा कर रहा था। उस समय,
जबकि पश्चिमी दुनिया अन्धकारमय थी, पूर्व क्षितिज का एक
उज्जवल सितारा चमका, जिससे विकल संसार को प्रकाश और
शान्ति प्राप्त हुई। इस्लाम झूठा मजहब नही हैं। हिन्दुओं को
3]
भी इसका उसी तरह अध्ययन करना चाहिए, जिस तरह मैने
किया हैं। फिर वे भी मेरे ही समान इससे प्रेम करने,लगेंगे।
मै पैगम्बरे-इस्लाम की जीवनी का अध्ययन कर रहा
था। जब मैने किताब का दूसरा भाग भी खत्म कर लिया, तो
मुझे दुख हुआ कि इस महान प्रतिभाशाली जीवन का अध्ययन
करने के लिए अब मेरे पास कोई और किताब बाकी नही। अब
मुझे पहले से भी ज्यादा विश्वास हो गया हैं कि यह तलवार
की शक्ति न थी, जिसने इस्लाम के लिए विश्व क्षेत्र में विजय
प्राप्त की, बल्कि यह इस्लाम के पैगम्बर का अत्यन्त सादा
जीवन, आपकी नि:स्वार्थता, प्रतिज्ञापालन और निर्भयता थी।
यह आपका अपने मित्रों और अनुयायियों से प्रेम करना
और ईश्वर पर भरोसा रखना था। यह तलवार की शक्ति नही
थी, बल्कि वे विशेषताए और गुण थे, जिनसे सारी बाधाए दूर
हो गई और आप (सल्तल्लाहु अलैहेवसल्लम) ने समस्त
कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर ली।
मुझसे किसी ने कहा था कि दक्षिणी अफरीका में जो
यूरोपियन आबाद हैं, इस्लाम के प्रचार से कॉप रहे हैं, उसी
इस्लाम से जिसने मराकों में रौशनी फैलाई और संसार वासियों
को भाई-भाई बन जाने का सुखद-संवाद सुनाया, निस्संदेह
दक्षिणी अफरीकी के यूरोपियन इस्लाम से नहीं डरते हैं, बल्कि
वास्तव में वे इस बात से डरते है कि अगर अफरीका के
आदिवासियों ने इस्लाम कबूल कर लिया तो वे श्वेत जातियों
से बराबरी का अधिकार मॉगने लगेंगे। आप उनको डरने
दीजिए। अगर भाई-भाई बनना पाप हैं, तो यह पाप होने
दीजिए। अगर वे इस बात से परेशान हैं कि उनका नस््ली
बड़प्पन, कायम न रह सकेगा तो उनका डरना उचित हैं,
क्योकि मैने देखा हैं अगर एक जूलों ईसाई हो जाता है तो वह
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फिर भी सफेद रंग के ईसाइयों के बराबर नहीं हो सकता।
किन्तु जैसे ही वह इस्लाम ग्रहण करता हैं, बिल्कुल उसी वक्त
वह उसी प्याले में पानी पीता हैं और उसी प्लेट में खाना
खाता हैं, जिसमे कोई और मुसलमान पानी पीता और खाना
खाता हैं। तो वास्तविक बात यह है जिससे यूरोपियन कॉप रहे
हैं। (जगत महर्षि पृष्ठ 2)
नबी/#का आखिरी खुतबा
हमारे प्यारे नबी सल्लललाहु अलैहिवसल्लम ने हिजरत के
दसवें साल में अपने आखिरी हज के अवसर पर सहाबए किराम के
सामने एक ऐतिहासिक खुतबा(अभिभाषण)दिया जिस में सारी मानवता
के कल्याण की शिक्षाएँ निहित हैं।
यह इस्लामी आचार-विचार का घोषणा पत्र है।आप सल्लल्लाहु
अलैहिवसललम ने फरमाया :
ऊ>त॒. प्यारे भाइयो! मैं जो कुछ कह रहा हूँ उसे,ध्यान से
सुनो। ऐ लोगो !
5 तुम्हारा रब एक है। अल्लाह की किताब कुरान,और उसके
रसूल की सुन्ननत को मजबूती से पकड़े रहना। लोगों की जान-माल
और इज़्ज़त का ख़याल रखना |
5 ₹. कोई अमानत रखे तो उसमें ख़यानत न करना।
ब्याज के क़रीब भी न जाना |
5ह. किसी अरबी को किसी अजमी (गैर अरबी) पर कोई प्राथमिकता
नहीं, न किसी अजमी को किसी अरबी पर, न गोरे को काले पर, न काले
को गोरे पर, प्रमुखता है ,अगर किसी को प्राथमिकता और प्रमुखता है तो
सिर्फ तक़वा व परहेज़गारी से है अर्थात् रंग, जाति, नस्ल, देश, क्षेत्र किसी
की फजीलत (श्रेष्ठता) का आधार नहीं है। बड़ाई का आधार अगर कोई है
तो ईमान और चरित्र है।
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5 अपने नौकर को.वही खिलाओ और पहनाओ जो ख़ुद पहनते और
खाते हो |
5 त. जेहालताअज्ञानताके तमाम विधान और नियम मेरे पाँव के नीचे
हैं।
हा इस्लाम आने से पहले के तमाम ख़्न मआफ़ कर दिए गए। (अब
किसी को किसी से पुराने ख़ून का बदला लेने का हक़ नहीं) और सबसे पहले
में अपने ख़ानदान का ख़ून-रबीआ इब्न हारिस का ख़्न मआफ़ करता हूँ।
दौरे जेहालत(अज्ञानकालॉंके सभी ब्याज ख़त्म किए जाते हैं और
सबसे पहले में अपने ख़ानदान में से अब्बास इब्न मुत्तलिब का ब्याज ख़त्म
ख़त्म करता हूँ |
5. औरतों के मामले में अल्लाह से डरो। तुम्हारा औरतों पर और
औरतों का तुम पर अधिकार हक़ है।
््र् औरतों के मामले में मैं तुम्हें वतीयत करता हूँ कि उनके साथ
भलाई का तरीक़ा अपनाओ।
उुएट. लोगो! याद रखो, मेरे बाद कोई नबी नहीं आने वाला और तुम्हारे
बाद कोई उम्मत (समुदाय) नहीं आएगी | अत: अपने रब की इबादत करना,
पाँचों वक़्त की नमाज़ पढ़ना। रमज़ान के रोज़े रखना, खुशी-खुशी अपने मात्र
की ज़कात देना, अपने पालनहार के घर का हज करना और अपने हाकिमों
का आज़ापालन करना। ऐसा करोगे तो अपने रब की जन्नत में दाख़िल होगे।
ऐ लोगो! कया मैंने अल्लाह का पैगाम तुम तक पहुँचा दिया!
लोगों की भारी भीड़ एक साथ बोल उठी):
हाँ! ऐ अल्लाह के रसूल|(सल्लललाहु अलैहिवसललम)
(इस के बाद आप(सल्लल्लाहु अलैहिवसललम) ने तीन बार कहा)
ऐ अल्लाह, तू गवाह रहा
(उसके बाद कुरआन की यह आखिरी आयत उतरी)
“ आज मैंने तुम्हारे लिए दीन को पूरा कर दिया और तुम पर अपनी नेमत
पूरी कर दी और तुम्हारे लिए इस्लाम को दीन की हैसियत से पसन्द किया"
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मीलादुन्नबी की फ़ज़ीलत
और
एतेराज़ात के जवाबात
मीलाद की परिभाषा क्या है ?
मिलाद या मोलिद "का अर्थ है जन्म का समय ,उर्फे आम में नबी
पाक सललल्लाहु अलैहिवसल्लम की विल्लादत ए पाक का बयान और
नूरे मुहम्मदी के करामात ,नसब नामा,या शीरख्वार्गी और हज़रत
हलीमा सादिया राज़ियाललाहू तआला अन््हा के यहाँ परवरिश पाने के
वाकेयात ब्यान करना या वह मिलाद सम्मेलन जिसमें सरकार मदीना
हजरत मोहम्मद सल्लललाहु अलैहि वसल्ल्म की विल्रादत तय्यिबा के
समय युग में प्रकट होने वाली अजीबोगरीब घटनाओं का उल्लेख
किया जाना,और उस में नबी पाक सल्लललाहु अलैहि वसललम की
सीरत और और उनकी हदीसों को ब्यान करना और उस पर मोमिनों
को चलने की ताकीद करना, हज़रत इमाम तिरमिज़ी रहमतुल्लाही
अलैह ने हदीस की मशहूर किताब “तिरमिज़ी शरीफ़'में मीलादुन्नबी
के नाम से पूरा एक बाब बाँधा है(पाठ बनाया है) |
मीलादुन्नबी /### की फजीलत
ईंद मिलादुन्नबी सललललाहु अलैहि वसललम का दिन
दुनिया भर के मुसलमानों के लिए महान खुशी और उत्सव का दिन
है. इसी दिन मुहसिने इंसानियत, खातिमे पीगम्बराँ ,ताज्दारे रसूलां,
अनीसे दो जहां,चारा साज़े दर्दमन्दांआकाए कायिनात ,फ़खरे मौजूदात
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,नबीय अकरम.सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम खाकदाने गीती पर जलवा
गर हुवे, आपकी बेअसत इतनी महान नेमत है जिसका मुकाबला
दुनिया की कोई नेमत और बड़ी से बड़ी हुकूमत भी नहीं कर
सकती.खुद अल्लाह रब्बुल इज्ज़त ने पैगंबर सल्लललाहु अलैहि
वसलल्लम की बेअसत पर अपना अनुग्रह और एहसान जताया. इरशाद
होता है |
“बेशक अल्लाह ने बड़ा एहसान फरमाया मुसलमानों पर कि
उनमें एक रसूल भेजा” (कुरआनसूरे,3,आयत.।64
नबियों और रसूलों (अलैहिमुस्सलाम) का जन्म दिन
सुरक्षा और सल्ाम्ती का दिन होता है. हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम
कहते हैं:
ही सुरक्षा मुझ पर जिस दिन मैं पैदा हुआ”. (सूरह: ॥9
आयत 39
दूसरी जगह हज़रत यहया अलैहिस्सलाम के लिए बारी
तआला का इरशाद है:
“सलाम्ती (सुरक्षा) है उन्हें जिस दिन पैदा हुए (कुरान सूरे-
9आयत)5)
हमारे सरकार तो इमामूल अम्बिया और सब्यिदुल्मुर्सलीन
हैं और सारी कायनात से बेहतर नबी हैं. (सल्लल्लाहु अलैहि
वसललम.) फिर आप की मीलाद का दिन क्यों न सुरक्षा और खुशी
का दिन होगा.
क्या सरकार मुस्तफा /## ने अपना मीलाद मनाया है ?
जी हाँ ! खुद सरकारे मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल््लम
ने सोमवार को रोज़ा रख कर अपने जन्म की खुशी मनाई और उनकी
इत्तेबाअ में आज तक अहले मोहब्बत मीलादुन्नबी का जश्न मनाते
आ रहे हैं. हदीस पाक में है :
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“नबी पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसल्ल्रम सोमवार और
गुरुवार को रोज़ा रखते थे” (तिरमिज़ी शरीफ़ )और एक अन्य
हदीस में है :
पैगंबर सलल््लललाहु अलैहि वसल्त्रम से सोमवार को रोज़ा
रखने का कारण पूछा गया तो आप ने कहा: 'इसी दिन मेरा जन्म
हुआ और इसी दिन मुझे वही नाज़िल हुई" (मुस्लिम शरीफ़र-८१९
किताबुस्सयामाबैहक़ी४-२८६)
“हज़रत आईशा राज़ियाल्लाहू अन्हा फरमाती हैं की
रसूलुल्लाह सलल्ललाहु अलैहिवसल्लम और हज़रत अबू कक्र
राज़ियाल्लाहू अन्हु ने मेरे पास अपने अपने मीलाद का उल्लेख
किया |(तबरानी कबीर,॥८५ मजमउज्ज़वायिद,९५६३)
एक दिन एक मजलिस में सहाबए किराम ने अर्ज़ किया या
रसूलललाह सललल्लाहु अलैहिवसल्लम हमें अपनी ज़ात के बारे में
कुछ बताईए,इस पर हुजूरे पाक सल्लल्लाहु अलैहिक्सललम ने
फरमाया:- मैं अपने बाप हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की दुवा हूँ,और
हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की बशारत हूँ मैं वह खुवाब हूँ जो मेरी
वालिदा(माँ)ने वज़ए हमल के वक़्त देखा की उन से नूर निकला जिस
से मुल्के शाम के महल्लात रौशन हो गए | (मिश्कात शरीफ़,५१३,अल
मुस्तदरक,२६१रमवाहिब,४११६)
क्या कुराने पाक में मीलाद मनाने का सुबूत है ?
कुराने पाक में अनेक जगहों पर अल्लाह पाक ने नबियों
की पैदाईश का ज़िक्र किया है जिस से मालूम होता है की यह
सुन्नते इलाही है और अल्लाह की मर्ज़ी के मोताबिक है जैसे
कुरान करीम में अल्लाह पाक ने हज़रत यहिया अलैहिस्सलाम के
बारे में इरशाद फरमाया :
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“यहिया अलैहिस्सलाम पर सलाम हो उनके मीलाद के दिन
और उनकी वफात के दिन और जिस दिन वह जिंदा उठाए जायेंगे”
(सूरह अल मरियम १५-१९)
ओर हजरते ईसा अलैहिस्सलाम के हवाले से
अल्लाह पाक ने इरशाद फरमाया :
“और मुझ पर सलाम हो मेरे मीलाद के दिन और मेरी
वफात के दिन और जिस दिन मैं जिंदा उठाया जाऊं”(सूरह
मरियम -१९-३३ )
इसी तरह हजरते आदम अलैहिस्सलाम के जन्म
का ज़िक्र करते हुवे अल्लाह पाक ने फरमाया :
“और याद करो जब तुम्हारे रब ने फरिश्तों से कहा कि मैं
आदमी को बनाने वाला हूँ बजती मिट्टी से जो स्याह बदबूदार काले
गारे से है,जब मैं उसे ठीक करलूं उस में विशेष आकर्षित,सम्मानित
आत्माएरूह) फूंक लूँ तो इसके लिए सजदे में गिर पड़ना तो जितने
फ़रिश्ते थे सब सजदे में गिर पड़े सिवाए इब्लीस के,की उसने सज्दा
करने वालों का साथ न दिया ” (अल हजर २८-३१-पारा-१५)
हज़रते मरियम राज़ियाल्लाहू अन्हा और हज़रत
यहया अलैहिस्सलाम की विलादत(जन्म)का ज़िक्र करते
हुवे अल्लाह पाक ने कुरान में फरमाया :-
“जब इमरान की बीबी ने अर्ज़ की.ऐ रब मेरे में मन्नत
मानती हूँ जो मेरे पेट में है कि ख़ालिस तेरी ही ख़िदमत में रहे,तो तू
मुझसे कुबूल करले बेशक तू ही सुनता जानता है, फिर जब उसे जना
बोली ऐ रब मेरे यह तो मैंने लड़की जनी,और अल्लाह को ख़ूब मालूम
है जो कुछ वह जनी और वह लड़का जो उसने मांगा इस लड़की सा
नहीं,और में ने उसका नाम मरियम रखा,और मैं उसे और
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उसकी औलाद को तेरी पनाह में देती हूँ रांदे हुए शैतान से, तो उसे
उसके रब ने अच्छी तरह कुबूल किया,और उसे अच्छा परवान
चढ़ाया,और उसे ज़करिया की निगहबानी में दिया जब ज़करिया उसके
पास उसकी नमाज़ पढ़ने की जगह जाते उसके पास नया रिज़्क
(जीविका) पाते, कहा ऐ मरियम यह तेरे पास कहां से आया बोली वह
अल्लाह के पास से है बेशक अल्लाह जिसे चाहे बे गिनती दे.यहाँ
पुकारा ज़करिया ने अपने रब को बोला ऐ रब मेरे मुझे अपने पास से
दे सुथरी औलाद बेशक तू ही है दुआ सुनने वाला;तो फ़रिश्तों ने उसे
आवाज़ दी और वह अपनी नमाज़ की जगह खड़ा नमाज़ पढ़ रहा
था,.बेशक अल्लाह आपको खुशख़बरी देता है यहया की जो अल्लाह की
तरफ़ के एक कलिमे की.पुष्टि करेगा और सरदाराहमेशा के लिये
औरतों से बचने वाला और नबी हमारे ख़ासों से,बोला ऐ मेरे रब मुझे
लड़का कहां से होगा मुझे तो पहुंच गया बुढ़ापाऔर मेरी औरत बांझ
है-फरमाया अल्लाह यूं ही करता है जो चाहे ,अर्ज़ की ऐ मेरे रब मेरे
लिये कोई निशानी कर दे, फ़रमाया तेरी निशानी यह है कि तीन दिन
तू लोगों से बात न करे मगर इशारे से और अपने रब की बहुत याद
कर,और कुछ दिन रहे और तड़के उसकी पाकी बोल 'सूरआले इमरान ३५४९)
अल्लाह पाक ने कुराने मजीद में हजरते ईसा
अलैहिस्सलाम की पैदाईश का बयान करते ह॒वे कहा:
“और किताब में मरयम को याद करो,ब अपने घर वालों से
पूरब की तरफ़ एक जगह अलग हो गई,तो उनसे उधर,वह उसके सामने
एक तंदुस्स्त आदमी के रूप में ज़ाहिर हुआ, बोली मैं तुझसे रहमान की
पनाह मांगती हूँ अगर तुझे ख़ुदा का डर है, बोला मैं तेरे रब का भेजा
हआ हूँ कि मैं तुझे एक सुथरा बेटा दूँ, बोली मेरे लड़का कहाँ से होगा
मुझे तो किसी आदमी ने हाथ न लगाया न मैं बदकार हूँ ,कहायूंही है,
तेरे रब ने फ़रमाया है कि ये मुझे आसान है, और इसलिये कि हम उसे
लोगों के वास्ते निशानी (प्रमाण.)करें और अपनी तरफ़ से एक रहमत और
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यह काम ठहर चुका है,अब मरयम ने उसे पेट में त्रिया फिर उसे लिये
हुए एक दूर जगह चली गई,फिर उसे जनने का दर्द एक खजूर की जड़ में
ले आया,बोली हाय किसी तरह मैं इससे पहले मर गई होती और भूली
बिसरी हो जाती,तो उसे जिब्रील ने उसके तले से पुकारा कि गम न
खा,बेशक तेरे रब ने नीचे एक नहर बहा दी है,और खजूर की जड़ पकड़
कर अपनी तरफ़ हिला, तुझपर ताज़ी पक्की खजूरें गिरंगी,तो खा और पी
और आँख ठलन््डी रख|फिर अगर तू किसी आदमी को देखे,तो कह देना
मैंने आज रहमान का रोज़ा माना है तो आज हरगिज़ किसी आदमी से
बात न करूंगी,.तो उसे गोद में ले अपनी क़ौम के पास आई, बोले ;ऐ
मरयम बेशक तूने बहुत बुरी बात की, ऐ हासन की बहन;तेरा बाप,बुरा
आदमी न था और तेरी माँ,बदकार न थी, इसपर मर॒यम ने बच्चे की तरफ़
इशारा किया;]वह बोले हम कैसे बात करें उससे जो पालने में बच्चा
है(बच्चे ने फ़रमाया, मैं हूँ अल्लाह का बन्दाउसने मुझे किताब दी और
मुझे गैब की ख़बर बताने वाला (नबी) किया,और उसने मुझे मुबारक
किया, मैं कहीं हूँ और मुझे नमाज़ व ज़कात की ताकीद फ़रमाई जब तक
जियूं और अपनी माँ से अच्छा सुलूक करने वाला,और मुझे ज़बरदस्त
बदबख़्त न किया,और वही सलामती मुझ पर,जिस दिन मैं पैदा हुआ और
जिस दिन मरूं और जिस दिन ज़िन्दा उठाया जाऊं,.यह है ईसा मरयम का
बेटा,सच्ची बाते जिसमें शक करते हैं
'पर्युक्त तमाम आयात से मालूम हुवा की नबियों की
मीलाद(जन्म) का उल्लेख करना अल्लाह पाक की सुन्नत है और इस में
कोई बुराई नहीं, और सब से अहम् बात यह है की आज कुछ लोग कहते
हैं की हम ने नबी को खुदा की सिफत से मुत्तसिफ कर दिया है,इस
एतराज़ का जवाब हम मीलाद मना कर देते हैं की देखो हम नबी की
मीलाद मना कर ए बताना चाहते हैं की जिस का मीलाद मनाया जाता
है वह खुदा नहीं हो सकता कियुंकि खुदा तो वह है जो पैदा होने से पाक
है,उस ने सब को पैदा किया है उस को किसी ने नहीं पैदा किया-
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अब आईए उन आयतों को देखें जिन में अल्लाह
पाक ने अपने हबीब की आमद का उल्लेख किया है
दुसरे पारा के सूरह अल बकरह आयत,१५१ में नबी ए पाक
की आमद का उल्लेख करते हुए अल्लाह पाक ने फरमाया :
“ इसी तरह हम ने तुम्हारे अन्दर तुम्हीं में से अपना एक
रसूल भेजा
तीसरे पारा के सूरह अल निसा आयत,१७० में फरमाया :
'ऐ लोगो ! निसंदेह तुम्हारे पास यह रसूल तुम्हारे रब की
तरफ से हक़ के साथ तशरीफ़ लाया है , तो तुम उन पर अपनी
भलाई के लिए ईमान लाओ ”
उपर्युक्त सभी आयतों में अल्लाह पाक ने अपने नबियों और रसूलों
के जन्म का उल्लेख किया है, जिस से ज्ञात होता है की नबियों और
रसूलों की विलादत[(जन्म)का उल्लेख करना अल्लाह पाक की सुनन्नत
है और इसे शिर्क व बिदअत कहना जिहालत और बेवकूफी है |
इस के अतरिक्त और भी आयतें हैं मगर संक्षेप में सिर्फ
इन्हीं पर बस किया जाता है-
कराने पाक में हजरते ईसा अलैहिस्सल्राम की
दुआ का उल्लेख करते हवे कहा गया
ईसा इब्न मरयम ने कहा हे अल्लाहहे हमारे रब ! हम पर
आसमान से एक दस्तरख्वान उतार की वह हमारे लिए और हमारे
अगले और पिछले लोगों के लिए ईद हो और तेरी तरफ से निशानी
(अल माइदह-७,११४)
आप देखें हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने फरमाया की आसमान
से खाने का दस्तरख्वान उतर जाए तो वह दिन ईद का दिन हो जाए,
तो जिस दिन सारी दुनिया के ताजदार और सब नबियों के सरदार का
आगमन हो वह दिन कियूं न ईदों की ईद हो |
4]
एक पल्ले में वह दोनों एक पल्ले में वह एक
दोनों ईदों से है अफज़ल ईद मीलादे रसूल
नबी ए पाक /&### के जन्म की ख़ुशी मनाने से
अबुलहब जैसे काफ़िर को भी फाईदा होगया
नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्ल्म के जन्म के समय अबू
लहब की लौंडी हज़रत सोवैबा (राज़ियाल्लाहू अनहा) ने आकर अबू
लहब को नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसललम की पैदाईश की खबर दी.
इसे अबू लहब सुनकर इतना खुश हुआ कि उंगली से इशारा करके
कहने लगा,सोवैबा ! जा आज से तो स्वतंत्र है.अबू लहब जिसकी निंदा
और बुराई में पूरी सूरे लहब नाज़िल् हुई ऐसे बदबखत काफिर को
मिलादे नबी (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) के अवसर पर खुशी मनाने
का क्या लाभ हुआ इसे हज़रत इमाम बुखारी की ज़बानी सुनिए:
“जब अबू लहब मरा तो उसके घर वालों में से (हज़रत
अब्बास रज़ियल्लाहु अन््हु) ने उसे सपने में बहुत बुरे हाल में देखा.
पूछाक्या गुज़री ? अबू लहब ने कहा तुमसे अलग होकर मुझे भलाई
नसीब नहीं हुई. हां मुझे (इस कलमे की ) उंगली से पानी मिलता है
जिस से मेरे अज़ाब और प्रकोप में कमी हो जाती है क्योंकि मैं ने
इसी उंगली के इशारे से सोवैबा को आज़ाद और मुक्त था ”
हजरत शेख अब्दुल्न हक़ मुहद्दिस देहलवी (७६४ हिजरी मृत
052 हिजरी) जो अकबर और जहांगीर बादशाह के युग के महान
आलिमे दीं व शोधकर्ता हैंइरशाद फ़रमाते हैं:
“ इस वाक़ेया में मीलाद शरीफ करने वालों के लिए रौशन दलील है
जो सरवरे आलम सल्लल्लाहु अलैहि वसलल्लम की शबे विलादत
(जन्म की रात)|खुशियां मनाते और धन खर्च करते हैं. यानी अबू
लहब जो काफिर था.जब उसे आं हज़रत (सल््लल्लाहु अलैहि वसललम)
42
की विलादत की खुशी और दासी के ज़रिया दूध पिलाने की वजह से
यह पुरस्कार व इनआम दिया गया तो मुसलमान का क्या हाल होगा
जो सरवरे आलम सल्लललाहु अलैहि वसल्लम की विलादत की खुशी
में प्यार से भरपूर होकर धन खर्च करता है और मिलाद शरीफ करता
है.(मदारिजुन्नुबुवत हिस्सा;दोयम:पृष्ठ,26)
प्यारे इस्लामी भाइयों खूब खूब ईंदे मिल्राद मनाओ . जब
अबू लहब जैसे काफिर को उनकी जन्म की खुशी मनाने पर लाभ
पहुंचा, तो हम तो मुसलमान हैं,नबी का कलम पढने वाले हैं - अबू
लहब ने अल्लाह के रसूल की पैदाईश की ख़ुशी मनाने के इरादे से
बांदी को आज़ाद नहीं किया, बल्कि अपने भतीजे की पैदाईश की
खुशी मनाई फिर भी उसे बदला मिला तो हम अगर अपने आक़ा व
मौला हज़रत मोहम्मद मुस्तफा सल्लललाहु अलैहि वसल्ल्म की
पैदाईश की खुशी मनाएं तो क्यों अल्लाह पाक के फ़ज़ल व करम से
वंचित और महरूम रहेंगे.कदापि नहीं, हमें ज़रूर इस पर सवाब
मिलेगा,और दीन व दुनिया दोनों में फाईदा पहुंचेगा |
घर आमिना के सस्यिदे अबरार आ गए
खुशियां मनाओं गमज़दों गमख्वार आ गए
नबी सल््लल्लाहु अलैहि वसललम अल्लाह की तरफ से बड़ी
दया और रहमत बनकर दुनिया में तशरीफ़ लाए.,अल्लाह पाक का
इरशाद है :
“और हम ने तुम्हें नहीं भेजा,लेकिन सारे संसार के लिए.दया
और रहमत बना कर "कुरआन पाक:सूरे 2,आयत 00
और अल्लाह की रहमत और दया पर खुशी मनाने का हुक्म तो पवित्र
कुरान ने हमें दिया है इरशाद होता है
“ए महबूब ! तुम फ़रमादों अल्लाह की कृपा और उसी की
दया, उसी पर चाहिए कि खुशी करें. (कुरआन सूरे॥०आयत,5)
43
इसलिए मीलादालनबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के अवसर
पर जितनी भी जायज़ खुशी,आनंद और उत्सव मनाया जाए कुरान
और हदीस की मंशा के अनुरूप है ए हरगिज़ हरगिज़ बिदअते सैएया
नहीं. बल्कि ऐसा अच्छा और बेहतर तरीका है जिस पर इनाम का
वादा है. हदीस पाक में:
“जो इस्लाम में अच्छा तरीका जारी करेगा तो उसे इनाम
मिलेगा और उनका इनाम भी उसे मिलेगा जो इसके बाद इस नए
तरीके का पालन करेंगे,और उनके पालन करने वालों के इनाम में कोई
कमी नहीं होगी. (मुस्लिम शरीफ़)
शबे कदर से भी बेहतर रात
हज़रत सैय्यिदुना शेख अब्दुल हक मुहद्धिस देहलवी
रहमतुल्लाह अलैह कहते हैं/वास्तव में सरवरे आलम की पैदाईश की
रात, शबे कदर से भी बेहतर है क्योंकि यह रात सरकार के इस
दुनिया में जलवा गर होने की रात है जबकि लैलतुल क़द्र सरकार को
प्रदान की गयी रात है, - (मा सबता बिहिस्सुनंह,पृष्ठ,स०,289 प्रकाशित
दारुल ईशा,अत बाबुल मदीना कराची)
मीलादुन्नबी के सदके यहूदियों को ईमान नसीब होगया
हज़रत सय्यिदुना अब्दुल वाहिद बिन इस्माईल रहमतुल्लाह
अलैह कहते हैं, मिस्र में एक आशिके रसूल रहा करता था जो
रबीउन्नूर शरीफ में अल्लाह के महबूब सल्ल्ल्लाहु अलैहि वसल्लम
की विलादत (जन्म) का खूब जश्न मनाया करता था; एक बार
रबीउन्नूर शरीफ के महीने में उनकी पड़ोसी यहूदी की औरत ने अपने
पति से पूछा कि हमारा मुस्लिम पड़ोसी इस महीने में हर साल विशेष
दावत और धार्मिक प्रोग्राम आदि की व्यवस्था क्यों करता है ?यहूदी
44
ने बताया कि इस महीने में उन के नबी की विलादत(जन्म) हुई थी
इसलिए यह उनके जन्म का जश्न मनाते है. और मुसलमान इस
महीने का बहुत सम्मान करते हैंड्स पर पर यहूदी की बीवी ने कहा,
वाह मुसलमानों का तरीका कितना प्यारा है कि ये लोग अपने प्यारे
नबीका हर साल जश्ने विलादत मनाते हैं. वे यहूदी औरत जब रात
को सोई तो उसकी सोया हुवा भाग्य अंगड़ाई लेकर जाग गया उस ने
सपने में देखा कि एक बहुत ही हसीन व जमील बुजुर्ग तशरीफ लाए
हैं, उन के आसपास भीड़ है. उसने आगे बढ़ कर एक व्यक्ति से पूछा,
यह बुजुर्ग कौन हैं?ठसने बताया कि यह नबीएआखिरुज्ज़मा हज़रत ,
मोहम्मद मुस्तफा सलल्त्रल्लाहु अलैहि वसललम हैं. आप इसलिए आये
हैं ताकि तुम्हारे मुसलमान पडोसी को जश्न जश्ने मीलादुन्नबी
मनाने पर खैर व बरकत प्रदान करें और उनसे मुलाकात करें तथा
उस पर आनंद व्यक्त करें. यहूदी औरत ने फिर पूछा|क्या आप के
नबी मेरी बात का जवाब देंगे?उन्होंने कहा किहाँ. इस पर य्हूदन ने
सरकारे आली वक़ार को पुकारातों आपने जवाब मैं लब्बैक कहा.
वह बेहद प्रभावित हुई और कहने लगी;मैं मुसलमान नहीं हूँ आप ने
फिर भी मुझे लब्बैक कह कर जवाब दिया. सरकार मदीना सलल््लल्लाहु
अलैहि वसल्लम ने इरशाद फरमाया. अल्लाह रब्बुल इज्ज़त द्वारा
मुझे बताया गया है कि तू मुस्लिम होने वाली है. इस पर वह
बेसाख्ता पुकार उठी. वास्तव में आप नबीए करीम और साहबे खुल्क़े
अज़ीम हैं हैंजो आपकी अवज्ञा और नाफरमानी करे वह बर्बाद हुआ
और जो आपकी कद्र और इज्जत न जाने वह खाइब व खासिर हुआ.
फिर खुवाब में हि कलिमा शहादत पढ़ा.
अब आंख खुल गई और सच्चे दिल से मुसलमान हो गई
और यह तय किया कि सुबह उठकर सारी पूंजी अल्लाह के प्यारे
महबूब के जश्नए विलादत की खुशी में लुटा दूंगी और खूब न्याज़
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करूंगी,जब सुबह उठी तो उसका शौहर दावत और निमंत्रण देने में
व्यस्त था. औरत ने आश्चर्य से पूछा आप क्या कर रहे हैं? उसने
कहा. इस बात की खुशी में दावत का आयोजन कर रहा हूँ कि तुम
मसलमान हो चुकी हो. पूछा।आपको कैसे पता चला?उसने बताया कि
आज रात मैं भी नबी ए पाक के हाथ पर ईमान ला चुका हूं
(ताज्किरतुल वायेजीन पेज स ० 5%8 मकतबा हबीबह क्वेटा)
मीलाद के बारे में बुजुर्गों
का अक़ीदा
सनदुल मोहद्देसीन हज़रत अल्लामा वलीउल्लाह
मुहददिस देहलवी अलैहिईहमह 'फयूज़ल हरमेन'पृष्ठ: 27 में कहते
हैं, मैं मक्का शरीफ़ में नबी ए पाक की विलादत के दिन मोलद
मुबारक (जहाँ आपा[सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम.) की विलादत हुई) में
हाज़िर हुआ तो लोग दुरूद शरीफ पढ़ रहे थे और हुजूरे पाक की
विलादत का उल्लेखाब्यानीकर रहे थे और वह चमत्कार[मोजज़ात)
बयान कर रहे थे जो आप के जन्म के समय प्रकट हुए. तो मैं ने इस
महफ़िल में अनवार व बरकात का मुशाहदा किया[देखा) ,मैंने गौर
किया तो हमें पता चला कि यह फरिश्तों के अनवार हैं जो ऐसी
मजलिसों में भेजे जाते हैं. और मैंने देखा की फरिश्तों और रहमत के
अनवार आपस में मिले हुए हैं
हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मक्की , अपनी पुस्तक,
“कुल्लियाते इमदादिया” में तहरीर फ़रमाते हैं कि "मशरब फ़क़ीर का
यह है कि महफ़िले मौलूद में शामित्र होता हूं बल्कि ज़रिए बरकात
46
समझकर मुन्अक्िद (आयोजित) करता हूँ और क़याम[खड़े होकर
सलाम पढ़ना) में लुत्फ़ व लज़्ज़त (आनंद और खुशी) पाता हूँ
(फ़ैसला हफ़्त मसअला, कुल्लियाते इमदादिया पेज 80, पंक्ति 4,
मकक्तबा दारुअशाअत, कराची)
हज़रत हसन बसरी राज़ियाललाहू अन्हु फरमाते हैं:“अगर मेरे
पास उहुद पहाड़ के बराबर सोना हो तो मैं उसे मीलादे मुस्तफा
सल्लल्लाहु अलैहिवसल््लम पर खर्च करदूं |
हज़रत जुनैद बगदादी अलैहिरहमः फरमाते हैं की ” जो मीलादे
मुस्तफा(सल््लललाहु अलैहिवसल्लमोमें हाज़िर हुवा और उसका
सम्मान किया,तो उसका खात्मा ईमान पर होगा “२
हज़रत मारूफ करखी अलैहिरहमःफरमाते हैं: “जिस ने मीलादे
नबी सल्लललाहु अलैहिव्सल्लम के लिए खाने का इंतज़ाम किया और
कुछ लोगों को इकट्ठा किया,और उन की ताजीम की नियत से चिरागां
किया और नए कपडे पहना,अत्र और खुशबु लगाया;तो अल्लाह पाक
उसका हशर अपने नेक लोगों के साथ फरमाएगा, और उसका ठिकाना
आलाइल्लीन(जन्नत का बड़ा दर्जा)अत फरमाएगा “३
हज़रत इमाम फखरुद्दीन राज़ी जो अपने ज़माने के बहुत बड़े
आलिम हैं ने फरमाया : जिस किसी खाने की चीज़ पर मिलादे नबी
पढ़ा तो अल्लाह पाक उस में बरकत अता फरमाएगा '- ४
हज़रत इमाम शाफ्यी रहमतुललाही अलैह फरमाते हैं : “जिस ने
किसी साफ़ सुथरे मकान में मीलादे नबी सल््रल्लाहु अलैहिवसल्लम
के लिए लोगों को इकट्ठा किया,और नेक काम किया तो अल्लाह
तआला उस की वजह से उसे बसरूज़े क़यामतसिद्दीक़ीन,शुहदा और
सालिहीन के साथ उठाएगा और और उसे जन्नाते नईम अता
फरमाएगा "- ५
47
हज़रत सर्री सकती अलैहिरहमः फरमाते हैं : जो महफिले मीलादे
मुस्तफा सल्लललाहु अलैहिवसल्त्रम में हाज़िर हुवा तो गोया की वह
जन्नत के बागों में से किसी बाग में दाखिल हुवा, कियुंकि वह बिला
शुबहा(निसंदेह)मीलाद में नबी की मुहब्बत में हाज़िर हुवा है '- ६
हज़रत इमाम जलालुद्दीन सुयूती अलैहिरहमः अपनी किताब
अश शमायित्र फी शर्हिशामायित्र में फरमाते हैं “जिस मस्जिद या
जिस घर या जिस जगह मिलादे नबी सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम
पढ़ा जाता है उसे रहमत के फरिश्ते ढांप लेते हैं और मालिके मकान
के लिए दुआ करते हैं, और हज़रत जिब्रील व मीकाईल व
इस्राफील[अलैहिमुस्सलाम|उस आदमी के दुआ करते हैं जिस ने
महफिले मीलाद मूनअकीद किया है,७ |
(१,२३,४.५,६,७,अल नेअमतुल कुबरा अलल आलम फी मौलिदे सस्यिदे
आलमपृष्ट ८ लेखक अल्लामा शहाबुद्दीन अहमद बिन हजार शाफयी,
रहमतुल्लाही अलैह)
हज़रत माल्राना शाह अब्दुल अज़ीज़ दहलवी रहमतुललाही
अलैह ने अपने एक ख़त में लिखा है, जिसे उन्होंने मुरादाबाद के
नवाब मोहम्मद अली खान को लिखा था :
“रहा मामल्रा मजलिसे मौलूद शरीफ़ का ,तो इस का हाल यह
है की बारहवीं रबीउल ओवल को लोग हस्बे मामूले साबिका[पोर्दु की
भांति)ंजमा होते हैं,और दुरूद शरीफ़ पढ़ने में मशगूल हो जाते
हैं'नाचीज़ भी हाज़िर होता है,पहले बाज़[(कुछ)अहादीसे मोबारका और
हुज़ूर नबी ए करीम सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम की विलादते बा
सआदत और कुछ अहवाले शीरखुवारगी(बचपन के हाल्लाताऔर हुलिया
शरीफ़ का ज़िक्र किया जाता है,और बाज़ अखबार व आसार जो उन
मोबारक औकात[समय) में ज़ाहिर हुवे,ब्यान किये जाते हैं,फिर माँ
हज़र[जो मौजूद हो)ख़ाने या शीरीनी पर फातिहा देकर उस को हाज़ेरीने
46
मजलिस में तकसीम कर दिया जाता है |(अल अन्वारुस्सातीआ डा
ब्याने मौलूद व फातिहा,पेज -२१४)
मीलादुन्नबी की तारीख
मीलादुन्नबी,का सुबूत तो कुराने पाक और हदीस शरीफ़ और
सहाबा के अमल से साबित है मगर इसे महफ़िल और जुलूस की
शक्ल और शाहाना अंदाज़ में मनाने की शुरुआत सातवीं सदी के शुरू
में इर्बल के बादशाह सुलतान मुज़फ्फर के ज़माने से हुवी,जिन का
इन्तेकाल ६३० हिजरी में हुवा,वह बहुत सखी बादशाह था, इब्ने कसीर
का ब्यान है की सुलतान मुज़फ्फर का मामूल था की वह मीलाद
शरीफ़ को बहुत ही शान व शौकत से मनाता था और इस मौक़ेपर
शानदार जश्न का एहतेमाम किया जाता था ,उस ज़माने के बड़े
आलिमे दीन शैख़ अबुल खत्ताब इब्न दिहिया ने उन की ताईद में
मीलाद के सुबूत पर एक किताब लिखी जिस का नाम"अल तनवीर फी
मौलिदिल बशीरिन नजीर'रखा |
मीलादुन्नबी को ईदों की ईद
कियूँ कहा जाता है ?
कुछ नादान ए सवाल करते हैं की जब इस्लाम में दो ही ईद
है.ईदुल फ़ित्रईदुल अज़हा,तो फिर ए तीसरी ईद कहाँ से आगयी जिसे
सुन्नी हजरात ईद ही नहीं बल्कि ईदों की ईद कहते हैं, उन्हें मालूम
होना चाहिए की ए दोनों तो शरई ईठदें हैं मगर इनके अलावा भी
इस्लाम में ईद का सुबूत है |
हज़रत अबुहुरैरा राज़ियाल्त्राहू अन्हु फरमाते हैं : जुमा का
दिन ईद है(मुस्तदरक लिल्हाकिम जिल्द,१,पेज,६०३)
49
हज़रत उक़बा बिन आमिर राज़ियाललाहू अन्हु फरमाते हैं की
:अरफा का दिन और कुर्बानी और तशरीक का दिन हमारे लिए ईद के
दिन हैं(अल मुस्तदरक लिल्हाकिम,जिल्द,१,पेज,६००)
और कुराने पाक में हज़रत ईसा अलिहिस्सलाम की दुवा आप
ने पढ़ लिया की उन्होंने कहा की : ए हमारे रब !हम पर आसमान से
एक दस्तरख्वान उतार की वह हमारे लिए और हमारे अगले और
पिछले लोगों के लिए ईद हो और तेरी तरफ से निशानी (अल माइदह-
७,११४)
इस से मालूम हुवा की इस्लाम दो ईदों के अलावा और
भी ईदें हैं मगर नबी पाक की पैदाईश का दिन ईदों की ईद
है,कियुंकि हदीस शरीफ में आया है की:जुमा का दिन तमाम
दिनों का सरदार है, और यह अल्लाह के यहाँ ईदुल अज़हा
और ईदुल फ़ित्र से भी अफज़ल है( निश्कात शरीफ,बाबुल जुमा
/ सुनने इब्मे माजा,हदीस, १०८४)
एक हदीस शरीफ में जुमा की फजीलत की वजह बताते हुवे
कहा गया की/जुमा इस लिए अफज़ल है कियुंकि इसी दिन हज़रत
आदम अलैहिस्सलाम की पैदाईश हवी,मेरे भाई ज़रा दिमाग लगाएं,
जब जुमा का दिन हजरते आदम के पैदा होने की वजह से अफज़ल
होगेया तो जिस तारीख़ में मेरे आक़ा नबियों के सरदार पैदा हुए वह
कियूं न सब से अफज़ल व बेहतर हो,
कुछ लोग कहते हैं की मीलाद मनाना बिदअत(नवाचार)है
हाँ ! कुछ लोगों को एसे तमाम कामों से नफरत है जिस को
अल्लाह के नेक बन्दों और नबी पाक के आशिकों ने शुरू किया
उनको अहले सुननत वल जमात का हर काम ना पसन्द लगता है और
ख़ास कर वह काम जिस से नबी ए पाक सल्लल्लाहु अलैहि वसलल्लम
की मोहब्बत का पता चले उन को सब से बुरा लगता है, उसी में से
50
एक यह भी है, लेकिन सच बात तो यह है की अगर कोई मीलाद
मनाने पर अगर यह पूछता है की तुम महफिले मीलाद कियूं मनाते
हो ? तो गोया की वह यह कहना चाहता है की तुम नबी के आने पर
कियूं खुश होते हो ? उन का का दूसरा एतराज़ यह है की'मीलाद ए
मुस्तफा"(सल्लललाहु अलैहि वसलल्लम)सहाबा,ताब्यीन,तब्ये ताब्यीन ने
इस तरह नहीं मनाई,तो हम कियूं मनाएं ! तो उन का आसान सा
जवाब यह है की क्या हर वह काम जिसे इन हज़रात ने नहीं किया
वह हम नहीं कर सकते ,अगर एसा ही है तब तो आज हमारे बहुत से
दीनी काम का जनाज़ा निकल जाएगा,एसे लोगों से हमारे कुछ
सवालात हैं,इस सिलसिले में जो उनका जवाब होगा वही हमारा भी
जवाब होगा |
मीलाद का इनकार करने वालों से हमारे कुछ सवाल
गैर सुन््नी फ़िरक़े (समुदाय) के यहाँ "जश्ने ईद मिलादुन्नबी”
मनाना इसलिए बिदअत है कि यह सहाबियों ने नहीं मनाया। हम उन
से ए पूछना चाहते हैं कि जो काम दिनरात आप के समुदाय के
ऊलमा और अवाम करते हैं, वह काम तो कभी सहाबियों और ताबेईन
ने नहीं किया। फिर आप उसे बिदअतऔर शिर्क कियूं नहीं कहते:
(।) क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुरुन ने तीन दिन निर्धारित
कर इज्तिमा (सभा) किया?
(2) कभी सहाबियों और ख़ेरुल्कुरन ने तौहीने रिसालत के
खिलाफ झंडे सहित जुलूस निकाला?
(3) क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुरुम ने अपने नाम के साथ
सल्फ़ी, मोहम्मदी और अहले हदीस लिखा?
(७) क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुस्म ने अहले हदीस,
सम्मेलन का आयोजन किया?
5
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(47)
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुरुम ने भव्य समारोह ख़त्मे
बुख़ारी का आयोजन किया?
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुरुम ने किसान सम्मेलन का
आयोजन किया
कया कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुस्न ने जिहाद फ़ी
सबीलिल्लाह सम्मेलन का आयोजन किया?
क्या कभी सहाबियों और ख़ेरुल्कुसन ने हुर्मते रसूल
सम्मेलन का आयोजन किया?
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुरुम ने हुर्मते रसूल के
जुलूस निकाले?
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुरुम ने शोहदा सम्मेलन का
आयोजन किया?
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुस्न ने तहफ़्फ़ूज़े बैतुल
मुक़द्दस सम्मेलन का आयोजन किया?
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुरुन ने तहफ़्फ़ूज़े क्रिब्ल-ए-
अव्वत्र के नाम पर जुलूस निकाले?
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुरुन ने सालाना दावते तौहीद
व तजदीदे अज़्म सम्मेलन का आयोजन किया?
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुरुम ने फ़त्हे मक्का
सम्मेलन का आयोजन किया?
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुरुम ने मुजाहिद किसान
सम्मेलन का आयोजन किया?
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुरुम ने ऊलमा संगोष्ठी का
आयोजन किया?
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुरुम ने सीरतुन्नबी सम्मेलन
का आयोजन किया
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(30)
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुरुम ने वारिसाने अम्बिया
सम्मेलन का आयोजन किया?
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुस्न ने तफ़्सीरे
दावतुल्कुरआन का तआरुफ़ी समारोह आयोजित किया?
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुरुम ने हर साल कुरआन व
हदीस सम्मेलन का दिन निर्धारित करके आयोजन किया?
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुर्म ने हर साल शाने
रिसालत सम्मेलन का आयोजन किया?
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुरुम ने एहतरामे रमजान
सम्मेलन का आयोजन किया?
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुरुन ने तरबियते हज
सम्मेलन का आयोजन किया?
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुरुम ने अपने मरहूमीन की
तरफ़ से कुरबानी का इश्तिहार (विज्ञापन) दिया?
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुरम ने मस्जिदों के
उद्घाटन पर समय निर्धारित करके समारोह आयोजित किया
और फिर खाना खिलाया?
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुस्न ने महित्राओं का
तबलीगी और सुधार सभा आयोजित किया?
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुरुम ने नए इस्लामी साल के
मोक़े पर हर साल मुबारकबाद (बधाई) दी?
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुरुम ने ऊलमा सम्मेलन का
आयोजन किया?
क्या कभी सहाबियों और ख़ैरुल्कुरुम ने अपने जामिया में
मुहरमुल्हराम के उपदेश किए?
क्या कभी सहाबियों ने अपने नाम के साथ हाफ़ीज़, सल्फ़ी,
मोहम्मदी और अहले हदीस लिखा?
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मस्जिदों पर, मीनार बनाना, कुरआन व हदीस के ज़ाहरी
शब्दों से साबित नहीं, लेकिन सभी, मीनार बनवाते हैं और जो
अमल कुरआन और सुन्नत साबित ना हो और कोई करे, तो
वह क्या कहलाएगा?
हदीस शरीफ में ऊंट, गाय, बकरी, दुम्बा जानवरों (पशुओं) की
कुर्बानी का उल्लेख है और उनके दूध पीने का जवाज़
(औचित्य) है, लेकिन भैंस का उल्लेख नहीं, तो भैंस के दूध,
दही, घी, लस्सी आदी का क्या हम है और प्रतिदिन भैंस का
दूध, दही, घी, लस्सी आदी पीते और खाते हैं, तो आप पर क्या
हकक्म (आदेश) लगना चाहिए?तथा हलाल कैसे कहलाएगा?
देवबंदियों के शिक्षण की प्रसिद्ध पुस्तक 'तबलीगी निसाब'"
जिसका नाम बदलकर'फ़ज़ाएले आमाल'रखा गया है, इसमें
लिखा है कि "अगर हर जगह दुरुद व सलाम दोनों को जमा
किया जाए, तो ज़्यादा बेहतर है, यानी बजाए अस्सलामु
अलैक या रसूलल्लाह के, अस्सलातु वस्सलामु अलैक या
रसूलल्लाह यानी सलात का शब्द भी बढ़ा दिया जाए, तो
बेहतर है" (देखें फ़ज़ाएले आमाल, अध्याय फ़ज़ाएले दुरुद,
पेज 23, मक्तबा मोहम्मद अब्दुररहीम ताजिरे कृतुब, लाहौर)।
क्या उस पर अमल करना चाहिए? अगर नहीं, तो यह
मुनाफ़ेक़्त (क्यों?
ये दो मिसरे(कड़ियाँ)बिदअत हैं या शिर्क?
१-मेरी कश्ती पार लगा दो या रसूलललाह।
(हाजी इमदादुल्लाह मुहाजिर मकक्की,क्ल्लियाते इमदादिया,पेज 205,दासलअशाअत,कराची)।
२ न्या रसुलल्लाह बाबुका ली।
तर्जमा: ऐ अल्लाह के रसूल, तेरा दरबार मेरे लिए है।
(अशरफ अली थानवी, नशरत्तय्यब, पेज 64,दारुलअशाअत,कराची)।
54
सारे देवबंदी मिलकर जवाब दें कि हाजी इमदादुल्लाह
मुहाजिर मक्की साहब और अशरफ अली थानवी साहब के बारे में
क्या हुक्म (आदेश) है, बिदअती होने का या फिर मुशरिक होने का?
आखिर हम भी तो यही जुमला(वाक्योाया सूलाल्लाह, या
नाबियाल्लाह,या या नबी सलाम अलैका कहते हैं.तो नाजाईज़ कैसे हो
जाता है
(35) जो व्यक्ति खुद को वहाबी, देवबंदी, अहले हदीस कहे और
आपकी जमाअत भी खुद को वहाबी, देवबंदी, अहले हदीस जमाअत
कहलवाती है। क्या किसी सहाबी ने खुद को वहाबी, देवबंदी, अहले
हदीस कहा था?नहीं ना तो फिर आप कैसे कहते हैं ?
(35) नबी पाक सल्लल्लाहू अलैहि व सल्लम के ईल्मे मुबारक को
मआज़ अल्लाह, चौपायों (पशुओं) के साथ मित्राना (देखेः हिफ़्ज़ुल
इमान, थानवी की गुस्तख़ाना इबारात, पेज 3, क़दीमी कुतुब ख़ाना,
कराची) और नमाज़ में नबी पाक सललल्लाहू अलैहि व सलल्रम के
ख़्याले मुबारक को बैल और गधे के ख़्याल से अधिक बुरा बता देना,
(देखे: सिराते मुस्तक़ीम, पृष्ठ 86, फ़तल सोम, मतबा मुजितबाई,
दिल्ली) ये नबी पाक नबी पाक सललल्लाहू अलैहि व सलल्लम की शान
में गुस्ताख़ी है या नहीं? अगर है और यक़रीनन है, फिर अशरफ अली
थानवी और इस्माइल देहलवी क्या कहलाऐंगे, जिन्होंने ऐसा
गुस्तख़ाना फ़त्वा दिया?
इसके अलावा भी कई ऐसे काम हैं, जो कभी सहाबियों और
ख़ैरुल्कुरुम ने नहीं किया लेकिन आप की पूरी कौम (समुदाय) इन
कार्यों को करती है और लाखों, करोड़ों, अरबों रुपये खर्च करती है। अब
उनके मर्कज़ी रहनूमाओं (केंद्रीय नेताओं) के फ़त्वे के अनुसार यह
सभी काम बिदअत नहीं हुए ??? अब अपने कारनामों को सहाबियों
और ख़ैरुल्कुरुम के अमल से साबित करो... ! ...! जी हाँ यह सब भी
ज़रूर बिदअत हैं लेकिन,आप लोग करते हैं इस लिए जाईज़ है, अगर
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यही काम हम अहले सुननत वल्र जमात के लोग करें तो नाजायिज़ हो
आप करें तो जाईज़, वाह भाई अजीब फलसफा है , सच कहा है -
खुदा जब दीन लेता है तो अक्लें छीन लेता है
हर नई चीज़ नाजाईज़ नहीं
हम पहले ही यह साबित कर चुके है की मीलाद मनाना
बिदअत नहीं और कुरान व हदीस से इस का सुबूत है है मगर इस के
बाद भी अगर कोई यह कहता है की जिस तरह आज कल अहले
सुननत वल जमात के लोग मीलाद का जुलूस निकालते है या मीलाद
और सीरतुन्नबी के नाम पर जलसे करते हैं इस तरह नबी पाक ने
और सहाबा ने नहीं किया तो उनका जवाब इस हदीसे पाक में है की
अल्लाह पाक के प्यारे रसूल सल्त्रल्लाहु अलैहि वसल््रम ने फरमाया
जिस ने इस्लाम में कोई अच्छा तरीक़ा जारी किया,तो उसे उसका
सवाब मिलेगा और जो लोग उसे करेंगे उन का सवाब भी इस को
मिलेगा,और इस के सवाब में कोई कमी न की जायेगी |
(मुस्लिम शरीफ़हदीसः४८३०सुनने इब्ने माजा, हदीसः२०४/ सुनने
दारमी.हदीस,५२१/वगैरह)
आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा फ़ज़ित्रे बरेलवी
अनह्ह्मा में फतावा रजविया में इस को
बहुत आसान तरीक़े से समझाया है |
आला हज़रत अलैहिरहमा फतावा रजविया में फरमाते हैं:
सस्यिदुना सलमान फ़ारसी राज़ियाल्लाहू अन्हू से रिवायत है
की: हुजूरे अक़दस सल्लललाहु अलैहिवसल्ल्म फरमाते हैं की.हलाल
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वह है जो अल्लाह पाक ने अपनी किताब कूराने पाक में हलाल किया
है और हराम वह है जो अल्लाह पाक ने अपनी किताब में हराम
बताया है और जिस से सुकृत[खामोशी)फरमाया वह मुआफ़ है यानी
उस में कोई पकड़ नहीं |(जामे तिरमिज़ी अब्वाबुल लिबास/सुनने इब्ने
माजा)
और इस का प्रमाण कुराने पाक में इस तरह मौजूद है
अल्लाह पाक का फरमान है : ए ईमान वालो !वह बातें न पूछो की
तूम पर खोल दी जाएँ तो तुम्हे बुरा लगे और और अगर कुरान
उतरते वक्त पूछोगे तो तुम पर ज़ाहिर कर दी जायेंगी अल्लाह ने उन
से मुआफ़ी फरमाई है और अल्लाह बख्शने वाला मेहरबान है(कुरआने
करीम,५१०१)
बहुत सी बातें ऐसी हैं की अगर अलाह पाक उनका हक्म
देता तो वह फ़र्ज़ हो जातीं और बहुत सी बातें ऐसी हैं की अगर उन
से रोक देता तो वह हराम हो जातीं,फिर जो उन्हें छोड़ता या करता तो
गुनाह में पड़ जाता.उस मालिके मेहरबान ने अपने अहकाम में उन
का ज़िक्र न फरमाया यह कुछ भूल कर नहीं की वह भूल और हर ऐब
से पाक है बल्कि हम पर मेहरबानी के लिए कि हम मुशक्कत में न
पड़ें तो मुसलामानों को फरमाता है की तुम भी उस को न छेड़ो, इस
आयत से मालत्रूम हवा की जिन बातों का कुरान व हदीस में ज़िक्र न
मिले वह हरगिज़ मना नहीं बल्कि अल्लाह की तरफ से माफ़ी है,दारे
कुतनी,में अबू ख्शनी राज़ियाल्लाहू अन्ह् से रिवायत है की सय्यिदे
आलम सलल्लल्लाहू अलैहि वसलल्लम ने फ़रमाया :बेशक अल्लाह पाक
ने कुछ बातें फर्ज़ की उन्हें हाथ से न जाने दो और कुछ हराम
फर्मायीं उन की ह्रमत न तोड़ो और कुछ हदें बाँधी उन से आगे न
बढ़ो,और कुछ चीज़ों से बे भूले सुकृत[खामोशी)फरमाया यानी उन के
बारे में कुछ न फरमाया उन में बहस न करो 5
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मुख्तसर यह की जिस काम के करने न करने के बारे में
कुरान व हदीस में कोई ब्यान नहीं अगर इस्लाम के उसूल्न से नहीं
टकराते तो उस के करने में कोई हर्ज नहीं और हदीस पाक से मालूम
हवा की अगर वह काम बेहतर है तो उस पर सवाब भी मिलेगा, और
फिर किसी को क्या हक़ पहँचता है की जिसे अल्लाह पाक ने हराम
नहीं कहा उसे हराम और शिर्क कहे(अल्लाह पाक ऐसे लोगों से बचाए)
इस दिन ईद कियूं मनाते हैं वफात का सोग कियूं नहीं?
कुछ लोग कहते हैं की १२ रबीउल ओवल को नबी पाक की
वफात हुवी थी इस लिए इस दिन मीलाद मनाना जाईज़ नहीं, (जब
की इस तारीख़ में भी इख्तिलाफ है)इस सन्दर्भ में पहली बात तो यह
है की.यह बात सभी जानते हैं की आम इंसान, नबियों और रसूलों के
बराबर नहीं हो सकते,उन से बराबरी का दावा तो इब्लीस के शागिर्द
ही कर सकते हैं,इस लिए उन की वफात और ज़िन्दगी को अपने ऊपर
केयास करना और समझना बहुत बड़ी गुस्ताख़ी है,मौत अम्बियाए
किराम और रसूलों को भी आती है मगर उनकी मौत सिर्फ एक लम्हे
के लिए होती है और फिर उस के फौरन बाद अल्लाह रब्बुल इज्ज़त
उनकी रूह को उनके जिस्म में दाखिल फरमा देता है,आला हज़रत
इमाम अहमद रज़ा अलिहिरहमः फरमाते हैं _
अम्बिया को भी अजल आनी है
मगर इतनी की फ़क़त आनी है
फिर उसी आन के बाद उन की हयात
मिस्ले साबिक वही जिस्मानी है
रूह तो सब की है जिंदा, उन का
जिसमे पुर नूर भी रुहानी है
ओरों की रूह हो कितनी लतीफ़
उनके अज्साम की कब सानी है
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पावों जिस ख़ाक पे रख दें वह भी
रूहै पाक है नूरानी है
यह हैं हैई,अबदी उन को रज़ा
सिदके वादा की क़ज़ा मानी है
और खुद अल्लाह के रसूल ने फरमाया है: की “अल्लाह
रब्बुल इज्ज़त ने ज़मीन पर हराम कर दिया है की वह नबियों और
रसूलों के जिस्मों को खाएं” यही वजह है की और लोगों के मरने
के बाद उनकी विरासत बाँट दी जाती है, उनकी बीवियों को दूसरी
शादी करने की इजाज़त होती है लेकिन नबियों और रसूलों की ना
तो विरासत बंटती है और न उनकी बीवियां उनकी वफात के बाद
किसी से निकाह कर सकती है,इसी लिए तो आला हज़रत ने
फरमाया है:
तू जिंदा है वल्लाह तू जिंदा है वल्लाह
मेरी चश्मे आलम से छुप जाने वाले
लेकिन यह बात याद रहे की ज़ाहिरी ज़िन्दगी और उस के
बाद की ज़िन्दगी में भी काफी फर्क है,नबी ए पाक का मर्तबा
ज़ाहिर करते हुवे अल्लाह पाक ने इरशाद फरमाया :आप का हर
आने वाला वक्त पिछले वक़्त से बेहतर है |
और खुद मेरे आक़ा ने इरशाद फ़रमाया की : मेरी
ज़िन्दगी और वफात दोनों में तुम्हारे लिए भलाई है”
और अगर इसी तारीख को वफात मान लिया जाए तब भी
इस दिन सोग नहीं मनाया जाएगा,कियुंकि मसला यह है की किसी
आम मखय्यित का भी तीन दिन से ज़यादा सोग मनाना जाईज़
नहीं,सिर्फ बेवा(विधवा)औरत को इस से ज़यादा की इजाज़त
है,(बुखारी शरीफ,१२८१/मुस्लिम शरीफ,२७३०तिरमिज़ी,१११६)
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हज़रते आदम अलैहिस्सलाम को अल्लाह रब्बुल इज्ज़त ने
जुमा के दिन पैदा फरमाया और इसी दिन उन की वफात भी हुई,
लेकिन इस को मुसलमानों के लिए ईद का दिन कहा गया
(अबूदावूद,शरीफ,१०४४नस्यी,१३७५३ब्ने,माजा,१३८४मुवत्ताइमाम, मालिक,१३१)
मालूम हुआ की नबियों और और रसूल्नों की पैदाईश की
ख़ुशी तो मनाई जायेगी, मगर उन की वफात का सोग न मनाया
जाएगा वरना जुमा के दिन को ईद का दिन न कहा जाता,और
अल्लाह के फरमान के अनुसार हमारे नबी सल्लल्लाहु अलैहि
वसलल्लम की हर आने वाली घड़ी पिछली घड़ी से बेहतर है,तो
उनकी फजीलत में हर हर लम्हा बढ़ोत्री हि हो रही है,फिर सोग
मनाने का तो सवाल हि पैदा नहीं होता, असल में बात यह है की
जिन का काम हि नबी पाक में कमी निकालना है.वह आप की
कोई बात नहीं मान सकते,हमारे सुन््नी आलिमे दीन हमेशा नबी
की खूबोयाँ तलाश करते हैं,और ए गुस्ताख लोग हर वक्त नबी की
कमियाँ तलाश करने में अपना वक्त बर्बाद करते हैं,आब इस के
अलावा और कया कहा जा सकता है की अल्लाह रब्बुल इज्ज़त
उन को हिदायत अता फरमाए,और उन्हें शुद्ध बुद्धि पर्दान करे |
एक बार कासिम नानौत्वीदेवबंदी आलिम)से पूछा गया
की,आप मीलाद नहीं करते जबकि मौलाना अब्दुल समी साहब
करते हैं,(तो इस पर नानौत्वी जी ने)कहा की उन को हुज़ूर से
जियादा मोहब्बत है;ुवा करो हमें भी हो जाएसवान्हे
कासमी,पहली,जिल्द.पेज,४७४/मजालिसे हकीमुल उम्मत,पेज,१२४)
इब्ने तैमिया जो वहाबियों का बड़ा मोतबर आलिम और
गुस्ताखों का सरगना है,वह भी यह कहने पर मजबूर होगया की
मुसलमान यह चीज़एमीलादुन्नबी)या तो इसायिओं की तकलीद में
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करते हैं,जो हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की यौमे विलादत को ईद
मनाते हैं,या फिर रसूल सल्लललाहु अलैहिवसल्लम की मोहब्बत
और ताजीम में ऐसा करते हैं,अल्ल्लाह तआला उनको इस बिदअत
पर नहीं बल्कि इस मेहनत और इज्तेहाद पर उन्हें सवाब देगा
(फिक्रो अकीदा की गुम्राहियाँ और सिराते मुस्तकीम के
तकाज़े,तर्जुमा-इक्तेज़ौस्सिरातिल मुस्ताकीम,पेज,७३,
इसी किताब के पेज ७७ पर इब्ने तैमिया ने लिखा
की'विलादते नबवी के वक्त की ताजीम और उसे ईद बनाने में
बाज़ लोगों को सवाबे अज़ीम हासिल हो सकता है,यह सवाब उन
की नेक नियति और रसूल सल्लललाहु अलैहिवसल्लम की ताजीम
की वजह से होगा
वहीदुज्ज़मा केरान्वी(वहाबी आलिम)ने लिखा की :मोतबर
यही है की महफिले मीलाद जाईज़ है,कियुंकि यह सवाब की नीयत
से ही होती है,फिर इस में बिदअआत का क्या दखल है (हदियातुल
मेहदी,पेज,४६)
सुबहनाल्लाहःकभी कभी दुश्मन भी सच्ची बात कह देते
हैं,सच है ,हम को अपने नबी से जियादा मोहब्बत है इस लिए हम
उनकी मीलाद मनाते हैं,उनकी नातें पढ़ते हैं,उनके गुण गाते हैं,
उन पर सलाम पढ़ते हैं,खुशी का मौका हो या गम का, हम हर
वक्त ज़िक्रे मुस्तफा सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम की महफ़िल सजा
लेते है,और जिन को रसूले पाक से मोहब्बत नहीं ,वह इसे देख
कर जलते रहते हैं,काश उन्हें भी समझ आजाती |
निसार तेरी चहल पहल पर हज़ारों ईदें रबीउल औउवल
सिवाए इब्लीस के जहां में सभी तो खुशियाँ मना रहे हैं
6]
जुलूसे मीलादुन्नबी # कैसे मनाएं
(१२)
जलूसे मीलाद में साफ़ सथरे]_हो सके तो नए कपडे पहन कर
जाएँ
सड़क के एक किनारे चलेंरास्ता बंद करने की कोशिश न करें
एसे नारे न लगाएं जिस से गैरों को तकलीफ़ हो
नारा लगाते वक़्त कूदने और बहुत चिल्लाने से परहेज़ करें
सोम वार को रोज़ा रखने की आदत बनाएं कियुंकि इसी दिन
हमारे नबी ए पाक“ की पैदाईश हुई थी
जुलूस में जाने का मत्लब यह है की आप उनकी आमद की
ख़ुशी मना रहे हैं,तो खुदा के वास्ते आप अपने अन्दर भी
उनकी मोहब्बत का चिराग जलालें और सुन््नतों का पैकर बन
जाएँ
नमाज़ अहम्मुल इबादत है,माहे रबीउल नूर में अहद करें की हम
नमाज़ कभी न छोड़ेंगे
इस मौके पर अपने घरों में चिरागां करें
उनकी सीरत पर लिखी गयी किताबें अपनों और गैरों में
तकसीम करें
उनके ज़िक्र की महफ़िले सजाएं-
जुलूसे मीलाद में हरगिज़ हरगिज़ कौवाली या गाने बाजे का
इस्तेमाल न करें
मीलाद या जुलूसे मीलाद में गैर इस्लामी काम न करें
इस किताब में तमाम बातें हवाले के साथ पेश कर दी गयी हैं,
अक़ल्मंदों के लिए इतना काफी है,वरना न मानने वालों के लिए पूरा
दफ्तर भी बेकार है, याद रखें की अगर हम नबी ए पाक के ज़िक्र का
कोई भी जाइज़ तरीका अपनाते हैं तो उस पर हमें सवाब मिलने का
यकीन है, कोई नहीं मनाता तो हम उसके लिए हिदायत की दुआ करते है
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विषयसूचि
पेशे लफ्ज़
इस्लाम की अजमत
इस्लाम के फैलने की वजह
डच राज नेता इस्लाम की आगोश में
हज़रत रसूले पाक £*
पैगम्बर£४# का जन्म
नसब नामाँ
आप /४%/# का अखलाक
रसूल ए पाक ££ गैरों की नज़र में
आप/##“का आखिरी खुतबा
मीलाद की परिभासा
मीलाद की फजीलत
सरकार /£ ने अपना मीलाद मनाया?
कुराने पाक में मीलाद का सुबूत
मीलाद और बुजुर्गों का अकीदा
मीलादुननबी ईदों की ईद कियूं
मीलाद का इनकार करने वालों से सवाल
हर नई चीज़ नाजाईज़ नहीं
इस दिन ईद कियूं मनाते हैं वफात का सोग कियूं
नहीं ?
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अल बरकात नेशनल इस्लामिक
एकेडमी का उद्देश्य
(१)उल्माए अहलेसुननत की किताबों को पर्काशित करना
(२)अहलेसुननत वाल जमात के अक़ाइद को वाजह करना
(3)नौजवानों को दीन से करीब करने की कोशिश करना
(४)यतीम और गरीब बच्चों को मदद करना
(५)अहलेसुननत के मदरसों को एक लड़ी में पिरोना
ज़रूरी एलान :
7४००७००८ पर इस पेज को लाइक करें और इस्लामी
बातें सीखें
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अलबरकात नेशनल इस्लामिक एकेडमी
सिद्दार्थ नगर भैरहवा नेपाल
एक दीनी और मज़हबी तंजीम है, आप इस का साथ दें ताकि हम
दिल खोल कर दीन का काम कर सकें |
(मौलाना) मजहर अली मिजामी अलीमी (मुख्य सचिव)
(०6०४० .२०. 9807555786 -980740436